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नई दिल्ली : : मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया है। इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए।
इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं और कई देशों ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला किया। इजरायली सेना के मुताबिक यह कार्रवाई कई महीनों की करीबी और संयुक्त योजना का नतीजा थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और सशस्त्र बलों के प्रमुख को निशाना बनाया गया।
इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल, बहरीन और उन जगहों पर धमाकों की आवाजें सुनी गईं जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, जिनमें अबू धाबी और दुबई (संयुक्त अरब अमीरात), कुवैत, रियाद (सऊदी अरब) और कतर के कई इलाके शामिल हैं।
तनाव बढ़ने के साथ ही यह सवाल उठने लगा है कि इस संघर्ष में कौन किसके साथ खड़ा है। क्षेत्र में ईरान पहले से ही दबाव में नजर आ रहा है।
ईरान के साथ कौन?
ईरान का प्रमुख सहयोगी समूह ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ कहलाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इजरायल की कार्रवाइयों से इस नेटवर्क को बड़ा नुकसान हुआ है। ईरान लंबे समय से मध्य-पूर्व में अपने सहयोगी अर्धसैनिक समूहों के जरिए अपनी सुरक्षा रणनीति चलाता रहा है।
इस नेटवर्क में लेबनान का हिज्बुल्लाह, इराक की पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF), यमन के हूती विद्रोही और गाजा का हमास शामिल हैं। ईरान का इराक और यमन में भी जमीनी प्रभाव रहा है।
पिछले सप्ताह ईरान, रूस और चीन के बीच सैन्य सहयोग तेज होता दिखा है। रूस ने अमेरिकी हमलों की निंदा की। रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तंज कसते हुए कहा कि शांति स्थापित करने वाला चेहरा फिर सामने आ गया।
पाकिस्तान और अन्य देश
एशिया में ईरान के करीबी देशों में पाकिस्तान का नाम भी लिया जाता है। पाकिस्तान एकमात्र इस्लामी देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। हालांकि जून 2025 में हुए 12 दिन के इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान इस्लामाबाद ने खुद को तेहरान से अलग कर लिया था।
अमेरिका के साथ कौन?
ईरान के पलटवार के बाद संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुवैत समेत कई मध्य-पूर्वी देशों ने इसे खतरनाक बढ़ोतरी बताया और जवाब देने की बात कही।
संयुक्त अरब अमीरात ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक दिया। अबू धाबी ने कहा कि वह जवाब देने का पूरा अधिकार रखता है। कतर ने भी अपने क्षेत्र पर हुए मिसाइल हमले की निंदा की और इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया।
कुवैत के सेना प्रमुख ने कहा कि वायु रक्षा प्रणाली ने देश के हवाई क्षेत्र में घुसी मिसाइलों को निशाना बनाया। वहीं सऊदी अरब ने यूएई, बहरीन, कतर, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की और इन देशों के साथ एकजुटता जताई।
पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया
अमेरिका के पश्चिमी सहयोगी देशों जर्मनी और फ्रांस ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और हालिया प्रदर्शनों पर कार्रवाई की आलोचना की है। हालांकि यह साफ नहीं है कि हमलों से पहले उन्हें कोई अग्रिम जानकारी दी गई थी या नहीं। फ्रांसीसी सेना के प्रवक्ता कर्नल गिलौम वर्नेट ने कहा कि फ्रांस अपनी सैन्य तैनाती की सुरक्षा के लिए लगातार स्थिति के अनुसार कदम उठा रहा है।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के कार्यालय ने कहा कि इटली क्षेत्र के देशों से संपर्क कर तनाव कम करने की पहल का समर्थन करेगा। साथ ही इटली ने ईरान की आम जनता के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के समर्थन की बात भी दोहराई।
इस तरह अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच सीधे हमलों के बाद पूरा मध्य-पूर्व अस्थिर हो गया है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि यह टकराव आगे और बढ़ता है या कूटनीतिक प्रयासों से हालात संभलते हैं।
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