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_मनुस्मृति और भारत का सर्वोच्च न्यायालय ……
न्याय और न्यायालय की अवधारणा समस्त संसार को भारत की देन है। भारतीय राज्य परंपरा के अनुसार न्यायाधीश को सब विद्याओं से पूर्ण विद्वान होना चाहिए। ‘ ऋषि दयानन्द जी के अनुसार सब सेना और सेनापतियों पर राज्याधिकार, दण्ड देने की व्यवस्था के सब कार्यों का आधिपत्य और सब के ऊपर स्थापित सर्वाधीश राज्याधिकार, इन चारों अधिकारों में सम्पूर्ण वेद शास्त्रों में प्रवीण पूर्ण विद्यावाले धर्मात्मा जितेन्द्रिय सुशील जनों को स्थापित करना चाहिये अर्थात् मुख्य सेनापति, मुख्य राज्याधिकारी, मुख्य न्यायाधीश और सभापति राजा से चार सब विद्याओं में पूर्ण विद्वान होने चाहियें।”
अंग्रेजों ने हमारे देश में जब अपने न्यायालय स्थापित किये तो उन्होंने संवेदनाशून्य न्याय प्रणाली की स्थापना की। जिनका भारतीय लोगों के प्रति तनिक सा भी लगाव नहीं था। वे सारे के सारे न्यायाधीश उपनिवेशवादी व्यवस्था की उपज थे। जिन्हें उपनिवेशवादी अधिकारियों , कर्मचारियों और स्वदेश के लोगों का बचाव करना था। वह इस प्रकार की व्यवस्था थी ” जिसमें मुंसिफ ही कातिल था। ” इसलिए सारे के सारे न्यायाधीश अन्याय करने के लिए बैठाए गए थे। उन अंग्रेज न्यायाधीशों में से किसी की भी आत्मा उनके साथ काम नहीं करती थी, क्योंकि उनकी आत्माएं मर चुकी थीं। दुर्भाग्य की बात यह रही कि जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके बाद भी वही संवेदनाशून्य व्यवस्था भारत में यथावत लागू रही। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज भी न्यायालयों की कार्य शैली पर विभिन्न प्रकार की शंका आशंकाएं व्यक्त की जाती हैं। इस संबंध में अनेक प्रकार के आलोचनात्मक लेख लिखे जाते हैं। सरकार की ओर से भी न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करने के समाचार अक्सर आते रहते हैं।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने मनुस्मृति के आधार पर समीक्षा करते हुए लिखा है कि ” कम से कम दस विद्वानों अथवा बहुत कम हों तो तीन विद्वानों की सभा जैसी व्यवस्था करे उस धर्म अर्थात् व्यवस्था का उल्लंघन कोई भी न करे। ”
वही देश उन्नति करता है जिसके न्याय शास्त्री उत्तम सुमति के साथ लोगों के साथ व्यवहार करते हैं और जिस व्यक्ति को उत्पीड़ित किया जा रहा है, उसे न्याय प्रदान करते हैं। जहां के न्यायाधीश उत्तम रीति से अर्थात धर्म के अनुसार व्यवहार करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं और लोगों को न्याय देने में तनिक भी विलंब नहीं करते हैं। रिश्वत आदि का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।
महर्षि मनु की मान्यता है कि :-
शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१॥
इस श्लोक में महर्षि मनु कह रहे हैं कि धन आदि से पवित्रात्मा सत्य संकल्प, न्यायशास्त्र के अनुसार चलने वाले अर्थात जिस प्रकार परमपिता परमेश्वर न्याय करने में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं करता, राग- द्वेष का प्रदर्शन नहीं करता, उसी प्रकार न्यायाधीश को भी किसी प्रकार का राग- द्वेष प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। उसे निष्पक्ष होकर न्याय प्रदान करना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक न्यायाधीश धार्मिक विद्वान हो। राजा के लिए उत्तम सहायकों – परामर्शदाताओं की आवश्यकता होती है, ये सारे के सारे उत्तम सहायक और परामर्शदाता भी वैदिक विद्वान होने चाहिए । क्योंकि जिस व्यक्ति का जितना अधिक सूक्ष्म ज्ञान होता है, वह उतना ही सांसारिक समस्याओं का उत्तमता के साथ समाधान खोज पाता है। जब किसी राजा को उत्तम सहायक और परामर्शदाता प्राप्त हो जाते हैं तो वह न्याय के अनुसार दंड विधान को चला सकता है। किसी के भी साथ अन्याय होने की संभावना नहीं रहती।
न्यायाधीश और न्याय
न्याय विभाग में कभी भी किसी भी स्थिति में किसी प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। क्योंकि बौद्धिक क्षेत्र में दिया गया आरक्षण निश्चित रूप से विनाशकारी होता है। न्यायाधीश का निष्पक्ष होना आवश्यक है। उसका वैदिक विद्वान होना भी आवश्यक है और उसे धर्म के सूक्ष्म तत्वों का ज्ञान होना भी आवश्यक है। जिससे वह यह जान सके कि जो कुछ वह कर रहा है, उसका परिणाम क्या होगा ? उसके किए का समाज और राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा और आने वाले समय में उसकी क्या व्याख्या हो सकती है ? जो न्यायाधीश इस प्रकार का आचरण करते हुए अपना न्याय प्रदान करता है, वह वास्तव में न्याय प्रिय होता है। अपनी न्यायप्रियता के कारण ही वह लोकप्रिय भी होता है, अर्थात लोग उसकी सराहना करते हैं। ऐसे न्यायाधीश के लिए किसी जाति, संप्रदाय, भाषा ,धर्म, लिंग आदि की संकीर्ण मानसिकताओं में बहकर काम करने की संभावना नहीं होती।
स्वामी दयानंद जी महाराज इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि- “इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का संगी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलने हारा, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है।” (सं०वि०, गृहाश्रमप्रकरण) (अन्यत्र व्याख्यात स०प्र०, समु० ६)
यशस्वी राजा
जो राजा न्याय के अनुसार दंड देता है, उसके यश में वृद्धि होती है। क्योंकि न्याय करने से उसकी दूर-दूर तक चर्चा होती है। इस चर्चा से उसकी ख्याति और यश दूर-दूर तक फैल जाता है। जिससे लोग उस न्यायशील राजा के बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं, जो इस प्रकार की न्यायपूर्ण प्रक्रिया का पालन करता है। उसे धार्मिक राजा के रूप में मान्यता देकर लोग उसका अत्यधिक सम्मान करने लगते हैं। जब कोई व्यक्ति धर्म का यथोचित पालन करता है तो वह यशस्वी हो ही जाता है।
महर्षि मनु स्वयं इस बात की व्यवस्था करते हैं कि जो राजा न्याय के अनुसार दंड देता है, उसके यश में वृद्धि होती है। वह लिखते हैं कि :-
एवं वृत्तस्य नृपतेः शिलोञ्छेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३॥
यह आवश्यक नहीं है कि किसी राजा के पास कुबेर जैसे धन के भंडार हों। यदि राजा न्याय प्रिय है तो वह धनहीन होकर भी लोगों के बीच लोकप्रिय हो सकता है। हमारे यहां लोकप्रिय होने के लिए राजा का न्याय प्रिय होना आवश्यक माना जाता था, धनी होना नहीं। लोगों के बीच ऐसे न्यायप्रिय राजा को ही सम्मान प्राप्त होता है । उसकी यह लोकप्रियता और लोगों से मिलने वाला सम्मान ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। इसी को वेद ने ” हम धन ऐश्वर्यों के स्वामी बनें ” कहकर महिमामंडित किया है। लौकिक धन की इच्छा तो मरणधर्मा लोगों को होती है, परंतु जिन लोगों का उद्देश्य लौकिक धन में फंसना नहीं होता है अपितु अपने शुभ कार्यों से संसार में यश और कीर्ति प्राप्त करना होता है, उनके लिए यह लौकिक धन भी कहीं न कहीं बाधा बन जाता है। इसी के दृष्टिगत महर्षि मनु कहते हैं कि इस प्रकार न्यायपूर्वक दण्ड का प्रयोग करने वाले राजा का शिल-उच्छ से निर्वाह करते हुए भी अर्थात् राजा के धनहीन होते हुए भी यश जैसे पानी पर डालने से तैल की बूँद चारों ओर फैल जाती है ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् में फैल जाता है।
वर्तमान समय में न्यायालयों की कार्यशैली
आज जिस प्रकार हमारे राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति और समाज के दूसरे वर्गों के लोगों में धन कमाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और जिस प्रकार यह मान्यता बल पकड़ती जा रही है कि जिसके पास जितना अधिक धन होगा, वह उतना ही अधिक सम्मानित होगा- इस प्रवृत्ति से न्यायालय के न्यायाधीश भी बचे नहीं हैं। यही कारण है कि हमारे देश में न्यायालय की कार्यशैली पर बार-बार प्रश्न चिन्ह लगता है। अनेक न्यायाधीशों के बारे में ऐसा सुनने को मिलता रहता है कि अमुक न्यायाधीश बहुत अधिक भ्रष्ट है। इससे पता चलता है कि न्यायालयों में भी भ्रष्टाचार फैल चुका है। इसका केवल एक ही कारण है कि वहां पर बैठे हुए न्यायाधीश उस सूक्ष्म बुद्धि के उपासक नहीं होते, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। उनके भीतर भी संसार के वही विकार मिलते हैं जो आमजन के भीतर देखे जाते हैं। ऐसे न्याय , न्यायालय और न्यायाधीशों की अपेक्षा महर्षि मनु नहीं करते। वैदिक व्यवस्था भी नहीं करती। वैदिक संस्कृति भी नहीं करती।
मनु महाराज कहते हैं कि ” विपरीत चलने वाले अर्थात् न्याय और सावधानीपूर्वक दण्ड का व्यवहार न करने वाले अजितेन्द्रिय राजा का यश जल में पड़े घी के बिन्दु के समान लोक में कम होता जाता है।”
राजा का मुख्य कार्य
महर्षि मनु कहते हैं कि अपने-अपने धर्म में संलग्न क्रमशः चारों वर्णों और आश्रमों के रक्षक के रूप में राजा को नियुक्त किया जाता है। इसका अर्थ हुआ कि राजा ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम , वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम में रहने वाले लोगों को पूर्ण सुरक्षा देने के लिए और उनसे अपने-अपने धर्म का पालन कराने के लिए नियुक्त किया जाता है। धर्म का पालन कराने का अभिप्राय है कि कानून व्यवस्था को बनाए रखना राजा का मुख्य कार्य है। राजा के रहते हुए सभी स्वाभाविक रूप से अपने-अपने धर्म का पालन करने वाले हों अर्थात सभी विधि का पालन करने वाले हों।
विधि का उल्लंघन करने वाले लोग समाज में अराजकता फैलाते हैं। जिनसे कभी भी सुव्यवस्था में भागीदार बनने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए राजा को चाहिए कि वह सभी लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करे कि वह सब स्वाभाविक रूप से अपने-अपने धर्म का पालन करने वाले बनें। यदि राजा सभी आश्रमस्थ व्यक्तियों को उनके धर्म में प्रवृत्त करने में असफल हो जाता है अथवा उनकी सुरक्षा करने में अपने आप को असहाय अनुभव करता है तो वह राजा राजा नहीं हो सकता।
संविधान में उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था
भारत के संविधान के अनुच्छेद 124 में व्यवस्था की गई है कि देश का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा। इस न्यायालय के सामने सर्वोच्च लगाने का अभिप्राय है कि इससे बड़ा कोई न्यायालय देश में नहीं होगा। अंग्रेजी जमाने में भारत के केस ब्रिटेन की प्रिवी काउंसिल के सामने भी जाया करते थे। उसका अभिप्राय था कि भारत के ऊपर भी कोई काउंसिल है। परंतु वर्तमान संविधान में जब 124 में यह व्यवस्था की गई कि भारत के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय होगा तो यह स्पष्ट हो गया कि इससे ऊपर कोई और दूसरा न्यायालय भारत के लिए नहीं है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय भारत की संप्रभुता का भी रक्षक है।
सर्वोच्च न्यायालय में कैसे न्यायाधीश होंगे और क्या उनकी योग्यता होगी ? इसके बारे में विस्तार से उस प्रकार नहीं बताया गया जिस प्रकार मनुस्मृति में इस संबंध में व्यवस्था की गई है। मनुस्मृति की विधिक व्यवस्था और वर्तमान संविधान की विधिक व्यवस्था में मौलिक अंतर है। जहां मनुस्मृति की विधिक व्यवस्था में हमारे न्यायाधीशों के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए उनकी योग्यता को भी स्पष्ट किया गया है कि उनके भीतर धार्मिकता के साथ-साथ वेदवेत्ता होने का गुण भी होना चाहिए, वह हमारे वर्तमान संविधान में नहीं है। इस संबंध में हमको यह भी बात ध्यान रखनी चाहिए कि श्रेष्ठ न्यायाधीश होने के लिए मनुष्य के हृदय में धार्मिकता का होना परम आवश्यक है और धार्मिकता के लिए व्यक्ति का वेदवेत्ता होना आवश्यक है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अंतर्गत भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के लिए योग्यताओं को स्पष्ट किया गया है। वहां पर उल्लिखित है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए किसी भी व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए। साथ ही उन्हें देश के किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश या 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य करने का अनुभव भी होना चाहिए अथवा उसे राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ होना चाहिए।
न्यायाधीश के बारे में मनु की व्यवस्था
महर्षि मनु भारत के मुख्य न्यायाधीश के बारे में विचार करते हुए स्पष्ट करते हैं कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को धर्मशास्त्रों का ज्ञाता, उच्च कुलीन, संयमी, निष्पक्ष, और सत्य का ज्ञाता होना चाहिए। देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में धर्म शास्त्रों का ज्ञाता यदि न्याय करने के लिए बैठेगा तो निश्चित रूप से उसे विधि संगत शास्त्र संगत और प्राकृतिक नियमों के अनुकूल न्याय करने की अपेक्षा की जाएगी। आज की जितनी भर भी विधि शास्त्र संबंधी पुस्तकें हैं , उनमें वेद के निर्मल ज्ञान को कहीं नहीं रखा गया है न ही भारत के प्राचीन ऋषियों के अनुसार तत्संबंधी व्यवस्थाओं को कहीं स्थान दिया गया है। इससे देश के न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में पहुंचने वाले लोग देश के लोगों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं। अनेक बार ऐसा देखा गया है, जब देश के न्यायाधीश ही भारतीय परंपराओं और विशेष रूप से वेद की परंपराओं के विपरीत आचरण करते हैं या विपरीत बोलते हैं। जिससे देश प्रेमी और वेद प्रेमी लोगों का हृदय छलनी होकर रह जाता है।
मनु महाराज की मान्यता रही है कि न्यायाधीशों को क्रोध और लोभ से मुक्त होकर राजा के साथ मिलकर धर्मानुसार निर्णय लेने वाला होना चाहिए। क्रोध कभी भी न्याय नहीं होने देता है। क्रोध के आवेश में आकर लोग न्याय की हत्या कर डालते हैं। इसीलिए मनु महाराज ने कहा कि न्यायाधीश जितना शांत ,संयमी, धैर्यशील होकर न्यायिक कार्यों का निस्तारण करेगा, उतना ही वह सटीक न्याय देने में सक्षम होगा। सात्विक बुद्धि न्यायाधीश को न्याय करने के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि सात्विक बुद्धि के भीतर ही एक सात्विक मस्तिष्क रहता है,जो शांत और संतुलित रहकर बुद्धि को सटीक निर्णय लेने में सहायता करता है। सात्विक बुद्धि वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन से बनती है। योग के अभ्यास से बनती है। इसलिए महर्षि मनु की यह भी मान्यता रही कि न्यायाधीशों को वेदों के जानकार और न्याय में निपुण भी होना चाहिए।
( डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक की पुस्तक “मनुस्मृति और भारतीय संविधान” से )
(डॉ राकेश कुमार आर्य )
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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