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डॉ राकेश कुमार आर्य की नई पुस्तक ” मनुस्मृति और भारतीय संविधान” की भूमिका….
‘मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र और संविधान भारत की मेधा शक्ति की पहचान है। आज संसार भर में जितने भर भी मत, पंथ, संप्रदाय प्रचलित हैं, उनमें से किसी के पास भी ऐसा गौरवपूर्ण मेधाशक्ति संपन्न अतीत नहीं है, जैसा भारत के पास है। उनमें से कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह एक मुस्लिम के रूप में या एक ईसाई के रूप में या एक पारसी या यहूदी के रूप में लाखों – करोड़ों वर्ष पहले रचे गए किसी मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्र का वह दावेदार है। मनुस्मृति ने राजनीति को जिस ऊंचाई पर जाकर प्रस्तुत किया और राजनीति की जितनी सुंदर और उत्कृष्ट परिभाषा दी, जितना पवित्र उसका धर्म घोषित किया,उतना संसार का कोई अन्य ग्रंथ नहीं कर पाया है, संसार का कोई संविधान भी इस कार्य को करने में असफल रहा है। जितने बड़े-बड़े राजनीति- शास्त्री संसार में हुए हैं, वह भी सब मनु के चिंतन के समक्ष कांतिहीन दृष्टिगोचर होते हैं। राजनीति को जिन लोगों ने वेश्या के स्तर तक पहुंचा दिया, वे चाहे कितने ही बड़े राजनीति शास्त्री क्यों न हों, परंतु वे राजनीति का कोई कल्याण कर सके हों या उसे लोक के लिए कल्याणकारी बनाने में सफल रहे हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
कोई संविधान या धर्मशास्त्र राजनीति की वैसी उत्कृष्ट परिभाषा नहीं कर पाया और न ही राजनीति का धर्म स्पष्ट कर पाया जैसा मनुस्मृति ने किया है। हां, आज का कोई भी मुसलमान या ईसाई मत का अनुयायी या किसी अन्य संप्रदाय का अनुयायी एक वैदिक धर्मी के रूप में ( जब कभी उसके पूर्वज वैदिक धर्मी हुआ करते थे ) मनुस्मृति पर अपना दावा अवश्य कर सकता है। इसीलिए मनुस्मृति मानवता की धरोहर है।
लोकतंत्र के मंदिर की मूर्ति मनुस्मृति
संसार भर के जितने भर भी संप्रदाय हैं , उनके साहित्य में हमें मनु से संबंधित प्रमाण मिलते हैं। उन प्रमाणों को चाहे कितना ही तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर दिया गया हो, परंतु एक बात तो सत्य है कि जहां- जहां भी मनु का उल्लेख होता है, वहां-वहां उनके प्रति विशेष सम्मान दिखाई देता है। इससे भी सिद्ध होता है कि वह महामानव मनु संपूर्ण मानवता के लिए श्रद्धा और सम्मान का केंद्र है। यदि उसे वैश्विक लोकतंत्र के मंदिर में रखी गई एक ऐसी पवित्रतम मूर्ति मान लिया जाए, जिसके सामने सब श्रद्धा से शीश झुकाते हैं तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी।
मनु ने सूर्यवंश की स्थापना की। यह सूर्यवंश भारत के क्षत्रिय वंश का ही नहीं, संपूर्ण वसुधा के वीर योद्धाओं के लिए सम्मान का प्रतीक बन गया। उन्होंने अपने राजवंश को सूर्यवंश के नाम से स्थापित किया। हम सभी जानते हैं कि सूर्य तेज का, प्रकाश का, ऊर्जा का अर्थात् ज्ञान का प्रतीक है। इसीलिए मनु महाराज ने संसार की पहले राजवंश को इस बात के प्रति प्रतिबद्ध किया कि वह संपूर्ण संसार से अज्ञान और अविद्या के अंधकार को मिटाने का कार्य करेगा। मनु महाराज ने संसार के पहले शासक के रूप में स्वयं यह संकल्प लिया कि अंधकार के स्थान पर वे सर्वत्र सूर्य का प्रकाश अर्थात ज्ञान का आलोक बिखेर देंगे। उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को आगे आने वाले राजाओं के लिए अनुकरणीय बनाया। इसलिए जीवन को साधना का प्रतीक बना दिया। उन्होंने यह भी संकल्प लिया कि वे संपूर्ण वसुधा से दासत्व की आसुरी प्रवृत्ति के भाव को मिटाएंगे। लोकतंत्र स्थापित करेंगे। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति को दी जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का सम्मान होगा । उसकी प्रतिभा को निखरने का अवसर दिया जाएगा। उसकी निजता को मुखरित होने का अवसर प्रदान किया जाएगा।
” न भूतो न भविष्यति ”
आसुरी भाव को मिटाकर दिव्यभाव को स्थापित करना किसी शूरमा का कार्य होता है। किसी बहुत बड़े धैर्यशील व्यक्तित्व का कार्य होता है। संसार में कई ऐसे तानाशाह हुए हैं जिन्होंने दिव्यता को मिटाकर तलवार के बल पर आसुरी शक्तियों को विराजमान किया। इस काम को तो अनेक लोग करके चले गए। आज भी कर रहे हैं और भविष्य में भी कर सकते हैं, परंतु मनु तो अपने आप में केवल एक हैं। अप्रतिम और अद्वितीय हैं। ” न भूतो न भविष्यति ” यह सूक्ति उन्हीं पर लागू होती है।
तानाशाहों ने अपने जीवन काल में अपने निहित स्वार्थ को साधने के लिए और संसार पर बलात शासन करने की अपनी इच्छा की तृप्ति के लिए रक्तपात किया, मारकाट की। आसुरी शक्तियों का जागरण किया, विस्तार किया। उनकी तलवारों ने लाखों – लाखों लोगों को काट काटकर अपनी प्यास बुझाई। परंतु उनमें से कोई भी मानवता के इतिहास में अमरत्व को प्राप्त नहीं हुआ, उन्हें इतिहास में उचित सम्मान नहीं मिला। उनकी कब्रों पर लोग आज तक जूते ही पटकाते हैं। क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया था ,वह धर्म के अनुकूल नहीं था,सृष्टि नियमों के अनुकूल नहीं था। मनुष्य की मर्यादा के अनुकूल नहीं था। मनुष्य की गरिमा के अनुकूल नहीं था। उधर अकेले मनु महाराज हैं, जिनको लोग धर्मशास्त्र के निर्माता के रूप में सम्मान देकर सर्वोपरि मानते हैं। उनके धर्मशास्त्र में मिलावट करने वाले लोगों ने उन्हें अपयश का भी पात्र बनाया, इसके उपरांत भी मेधा जगत में लोग उन्हें सम्मान का ही पात्र मानते हैं।
लगाई जाए मनु की आदमकद प्रतिमा
हमारा मानना है कि महर्षि मनु को उचित सम्मान देने के लिए भारत में सरकारी स्तर पर विशेष कार्य किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति भवन के मुख्य द्वार के सामने महर्षि मनु की आदमकद प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। जिससे कि कोई भी विदेशी राष्ट्रपति जब हमारे राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करे तो वह भी यह देखकर जाए कि हम अपने आदि संविधान निर्माता महर्षि मनु के प्रति कितने श्रद्धावान हैं ? हम बहुत ही गर्व के साथ अपने आपको मनुवादी घोषित करें। जिस स्थान पर हमारे गणतंत्र दिवस के समय पर परेड का आयोजन किया जाता है, उस परेड स्थल को महर्षि मनु स्थल के नाम से सरकारी अभिलेखों में अंकित किया जाए। राष्ट्रपति भवन और संसद के पास से मंत्रालयों के लिए जितनी सड़कें अथवा मार्ग निकलते हैं, उन सब का नाम अलग – अलग 14 मनुओं के नाम पर रखा जाना चाहिए। महर्षि मनु के धर्म चिंतन, राष्ट्र चिंतन, सामाजिक चिंतन पर काम करने वाले शोधार्थियों के लिए विशेष सुविधाएं सरकारी स्तर पर प्रदान की जानी चाहिए। इस बात पर विशेष अनुसंधान और शोध होना चाहिए कि महर्षि मनु का चिंतन आज के समय के लिए कितना प्रासंगिक है ?
किसी भी व्यक्ति को विवादित कहकर उसके शुभचिंतन से बचकर निकलने से काम नहीं चलेगा। यदि चिंतन शुभ है तो उस शुभ चिंतन को अर्थात् उनके शिव संकल्प को यथार्थ रूप में उतारने के लिए संघर्ष करने से काम चलेगा। जिन लोगों ने महर्षि मनु को विवादित घोषित किया है, उनके ‘विवादित मानस’ का उपचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि महर्षि मनु विवादित नहीं हैं ,विवादित वे लोग हैं जिन्होंने महर्षि मनु को विवादित बनाने का दुष्चक्र चलाया है। इस प्रकार के राष्ट्रघाती प्रयासों को जनमानस के सामने स्पष्ट करने की आवश्यकता है। जो लोग तेजी से इस प्रकार के प्रयासों का शिकार हो रहे हैं, उन्हें रोककर राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ जोड़े रखने का उद्यम करना समय की आवश्यकता है। अब इस बात की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है कि विनाशकारी तूफान कभी आएगा और हम सब मिलकर उसका सामना करेंगे ? इसके स्थान पर यह सोचने की आवश्यकता है कि विनाशकारी तूफान आ चुका है और अब हम सब उसका मिलकर सामना करने के लिए तैयार हैं। अच्छी बात तो यह होती है कि तूफान आने से पहले तैयारी की जाए, परंतु हम आंखें मूंदे बैठे रहे और समय पर हमने तैयारी नहीं की ।
सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता
आज जब जय भीम जय मीम हमारी राष्ट्रीय एकता को खतरा बन रहा है, कम्युनिस्ट विचारधारा हमें उजाड़ने के लिए तैयार खड़ी है, टुकड़े-टुकड़े गैंग हमारे टुकड़े करने की तैयारी कर रहा है , कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षतावादी सोच राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो चुकी है, तब उन सभी शक्तियों को मिलकर काम करना चाहिए जो राष्ट्रीय एकता के लिए अपने आप को समर्पित समझती हैं और जिनका उद्देश्य भारत और भारतीयता के लिए जीना है। उन लोगों को भी साथ आकर काम करने की आवश्यकता है जो यह भली प्रकार जानते हैं कि महर्षि मनु की विचारधारा ही देश की एकता और अखंडता को बचाये रख सकती है ,देश की सामाजिक समरसता की एकमात्र गारंटी है।
डॉ सुरेंद्र कुमार जी का मत
डॉक्टर सुरेंद्र कुमार जी लिखते हैं :- ” आदि मानव-समाज के मूल रूप से जुड़ाव का जैसा अनोखा उदाहरण मनु स्वायम्भुव का मिलता है वैसा उदाहरण समाज में विरला ही मिलता है। जैसे वणिक् वर्ग के सभी व्यक्ति महाराजा अग्रसेन के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण ‘अग्रवाल’ कहते और लिखते हैं, ठीक उसी प्रकार आदि मनु स्वायम्भुव के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण संस्कृत में पाए जाने वाले ‘आदमी’ के वाचक प्रायः सभी शब्द मनु से व्युत्पन्न हैं, जैसे- मानव, मनुष्य, मनुज, मानुष आदि। यही नहीं समस्त यूरोपीय भाषाओं में भी इस प्रकार के शब्द मनुमूलक शब्दों के ही अपभ्रंश हैं, जैसे- अंग्रेजी में Man (मैन), जर्मनी में Mann (मन्न), Manesh (मनेश), लैटिन व ग्रीक में Mynos (मायनोस), स्पेनिश में Manna (मन्ना), आदि। यह सम्बन्ध यह सिद्ध करता है कि मनु मानव समाज के आदि पुरुषों में से हैं और उनका समाज में अति महत्वपूर्ण योगदान और स्थान रहा है। दुख का विषय यह है कि मानव समाज के आदि व्यवस्थापक और मानवीय मूल्यों के आदि संस्थापक, आदि राजा और आदि संविधानप्रदाता राजर्षि एवं महर्षि मनु का क्रमबद्ध पर्याप्त इतिहास हमें उपलब्ध नहीं है, वह फुटकर रूप में उपलब्ध है। अत्यन्त प्राचीनता के कारण उनका इतिहास विस्मृति के अन्धकार में विलुप्त हो गया है। अब हमें उनके फुटकर ऐतिहासिक सन्दर्भों से इतिहास का अन्वेषण करना पड़ रहा है। जब तक हम उनका कालनिर्णय नहीं कर लेंगे तब तक मानव समाज और मानवता के लिये उनकी देन का सही सही मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे।”
सनातन समाज और मनुस्मृति
मनुस्मृति स्पष्ट करती है कि मनुष्य के जीवन निर्वाह का सही मार्ग क्या है ? उसकी सही रीति नीति क्या है ? प्राचीन भारतीय शास्त्र मनु की चिंतन शैली से प्रभावित दिखाई देते हैं। अनेक ग्रन्थों में उनकी व्यवस्था का अर्थात उनके धर्मशास्त्र का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक वैदिक धर्मी हिंदू अथवा सनातनी महर्षि मनु के प्रति अपनी पूर्ण श्रद्धा अर्पित करता है। महर्षि मनु ने चारों वेदों के मर्म को निचोड़कर अपनी मनुस्मृति में स्थापित किया। इस प्रकार मनुस्मृति वेदों का निचोड़ कही जा सकती है। जिसकी विधि को पढ़ और समझकर हमारे भटके हुए मानस की तृप्ति होती है। हृदय को असीम शांति की अनुभूति होती है। मानव को संसार के बीहड़ जंगल में एक स्पष्ट और सीधा मार्ग दिखाई देता है, जो उसे सीधे मोक्ष की ओर लेकर चलता है।
जिस मार्ग को ढूंढने में जीवन खप जाते हैं, उसे मनुस्मृति के अध्ययन से झट पहचान लिया जाता है। महर्षि मनु ने वेद का अध्ययन कर मनुष्य के लिए इस विधि शास्त्र का निर्माण किया और उसे क्रियात्मक स्वरूप भी प्रदान किया अर्थात उन्होंने सैद्धांतिक पक्ष को ही नहीं लिया अपितु व्यावहारिक पक्ष को स्पर्श करने का भी सराहनीय कार्य किया। उनके इस परिश्रम और पुरुषार्थ को आज भी फिलिपींस , बाली, थाईलैंड, वियतनाम जैसे देशों में सम्मान मिलता है। यही कारण है कि उनके बारे में आज भी संसार के विभिन्न देशों के साहित्य में हमें बहुत कुछ पढ़ने को मिलता है। उनको याज्ञवल्क्य जी ने भी अपनी स्मृति में स्मरण किया है। महामेधा संपन्न चाणक्य ने भी अपनी चाणक्य नीति में उनके व्यक्तित्व को नमन किया है। पुराण आदि में भी उनके विषय में हमें पढ़ने को मिलता है। ब्राह्मणों, उपनिषदों और रामायण में भी उनका कहीं न कहीं उल्लेख किया है।
महामति चाणक्य औरमनुस्मृति
भारतवर्ष में चाणक्य के काल में एक विशेष वैचारिक क्रांति हुई। जिसके कारण भारत विदेशी हमलावर सिकंदर के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ और अपनी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने का उसने सराहनीय कार्य किया। इस क्रांति के नायक के रूप में चाणक्य को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। यह कुछ उसी प्रकार था जैसे कांग्रेस ने गांधी जी को स्वतंत्रता संग्राम का महानायक घोषित किया और उनके गुणगान करने पर लग गई। यद्यपि चाणक्य और महात्मा गांधी जी के व्यक्तित्व की कोई तुलना नहीं की जा सकती। चाणक्य की बौद्धिक क्षमताओं को सारा संसार आज भी नमन करता है। देश के प्रति उनका समर्पण और राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए उनके जीवन का संघर्ष आज भी हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है। उनके परिश्रम और पुरुषार्थ को जानने वाले लोगों ने चाणक्य को महिमामंडित किया।
जिसका परिणाम यह हुआ कि चाणक्य नीति को लोगों ने अधिक प्राथमिकता दी और धीरे-धीरे मनुस्मृति को पीछे हटाया जाने लगा। मनुस्मृति के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए उसे तत्कालीन भारतवर्ष ने धीरे-धीरे धर्मशास्त्र तक सीमित कर दिया। यही वह काल था जब मनुस्मृति एक ऐसे वर्ग के हाथों में चली गई जिसने अपनी सर्वोच्चता को सिद्ध करने के लिए इसमें मनमाने ढंग से मिलावट करनी आरंभ की।
विलियम जॉन्स ने 1794 में मनुस्मृति का अनुवाद किया और इसे हिंदू धर्म शास्त्र या कानून के ग्रंथ के रूप में मान्यता प्रदान की । इसी के आधार पर उसने हिंदुओं के लिए विधि बनाने का काम किया। उसके बाद स्वामी दयानंद जी महाराज ने मनुस्मृति पर विशेष अनुसंधान किया और उसकी ऐतिहासिकता तथा पवित्रता को लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर इसकी वास्तविकता का बखान किया।
वर्ण व्यवस्था और विदेशी विद्वान
मनुस्मृति की वर्ण आश्रम व्यवस्था के बारे में पी डी ऑस्पेंस्की , ए न्यू मॉडल ऑफ द यूनिवर्स ने पृष्ठ 509 पर लिखा है कि – ” मनुष्यों का चार वर्णों में वर्गीकरण एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। इसका कारण यह है कि वास्तव में यह एक स्वाभाविक वर्गीकरण है । चाहे लोग इसे चाहें या ना चाहें , चाहे वे इसे मानें या न मानें मगर वह चार वर्गों में विभाजित हैं । समाज में ब्राह्मण हैं , क्षत्रिय हैं , वैश्य हैं और शूद्र हैं । कोई भी मानवीय कानून कैसी भी दार्शनिक गुत्थियां ,कोई अप्राकृतिक विज्ञान और किसी प्रकार का आतंक इस सत्य को नष्ट नहीं कर सकता है और मानव समुदायों का विकास और सामान्य क्रियाकलाप तभी संभव है जबकि स्वाभाविक चतुर्विध वर्गीकरण को माना और क्रियान्वित किया जाए । ”
एक विदेशी लेखक मनुस्मृति की वर्ण-आश्रम व्यवस्था की प्रशंसा कर रहा है और उसे आदर्श सामाजिक व्यवस्था बता रहा है। परंतु भारतवर्ष में कुछ लोगों ने वर्णाश्रम व्यवस्था को जाति-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार मानकर उसे भी स्वीकार करने का कार्य किया है।
” जाति यथार्थ में क्या है ? -इस बात को लाख में से एक भी नहीं समझता। संसार में बिना जाति का कोई देश नहीं है ।भारतवर्ष में इस जाति से चलकर ऐसी अवस्था पर पहुंचते हैं , जहां कोई जाति ही नहीं है । इसी सिद्धांत पर जाति की सारी रचना हुई है। भारत की यही योजना है कि प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मण बनाया जाए। क्योंकि ब्राह्मण मानवता का आदर्श है। “
ब्राह्मण की सर्वोच्चता का आरक्षण
हमसे गलती वहां पर हुई जब हमने अपने इस राष्ट्रीय संकल्प को शिथिल कर दिया कि हम प्रत्येक व्यक्ति को ही ब्राह्मण बनाएंगे। यह विकार उस समय और अधिक भयंकर हो गया जब ब्राह्मण ने अपने आप को किसी जाति से बांध लिया। इसके साथ ही साथ उसने अपने आपको जाति के आधार पर श्रेष्ठ घोषित कर दिया। इस प्रकार उसने अपने आपको सर्वोच्च बनाए रखने का आरक्षण स्वयं ही कर लिया। यह आरक्षण दूसरे लोगों को अच्छा नहीं लगा। ब्राह्मण को तो अन्य लोगों को ब्राह्मण बनाने के लिए अपने आप को समर्पित करना चाहिए था अर्थात पूरे समाज को देवताओं का समाज बनाने की जिम्मेदारी ब्राह्मण के ऊपर थी। परंतु उसने ऐसा न करके कह दिया कि अन्य किसी को देवता बनने का अधिकार नैसर्गिक आधार पर ही नहीं है, क्योंकि वह ब्राह्मण होकर जन्मना इस पद के लिए आरक्षित होकर आया है। जिन लोगों ने अपने आप को ब्राह्मण होकर दूसरे लोगों को ब्राह्मण बनाने के काम के साथ जोड़े रखा, उन्हें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं हुई कि ब्राह्मण एक वर्ण है। उसे जाति नहीं माना जा सकता । ब्राह्मण होकर उसे किसी अन्य के साथ अन्याय करने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि उसका जीवन दूसरों के उद्धार के लिए मिला है।
स्वामी विवेकानंद जी ने लिखा है
” हमारा आदर्श अध्यात्मिक संस्कृति संपन्न , वैराग्य वान ब्राह्मण है, ब्राह्मण आदर्श से मेरा मतलब क्या है ? – मेरा मतलब है आदर्श ब्राह्मण अथवा जिसमें संसारी भाव बिल्कुल नहीं हो और यथार्थ ज्ञान प्रचुर मात्रा में हो । “
वास्तव में मनु महाराज की यह बहुत ही दूरगामी सोच थी कि उन्होंने एक पूरा वर्ण ही मनुष्य मात्र को ज्ञानवान बनाने लिए बनाया। इस वर्ण का कार्य केवल ज्ञान का प्रचार प्रसार करना था। वैदिक शिक्षाओं को हर व्यक्ति के मन मस्तिष्क में बैठा देना था। जब सभी विद्वान होंगे , शिक्षित होंगे और संस्कारवान होंगे तो संसार में राक्षसी प्रवृत्तियों को पनपने का अवसर नहीं मिलेगा।
जिन लोगों ने ज्ञान और विद्या पर अपना अधिकार कर लिया, उन्होंने संसार का भारी अहित किया । इससे शिक्षा का महारोग संसार भर में फैल गया। जिससे दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति मानव के भीतर जाग उठी । परिणाम आया कि सर्वत्र हिंसा, रक्तपात, मार काट की धुआंधार मच गई । इसी मूर्खता के कारण संसार में अनेक मत उत्पन्न हुए । जिन्होंने खेमाबंदी करके अपने से विपरीत मजहब के लोगों को करोड़ों की संख्या में तलवार के घाट उतारने का महापाप किया। यदि मनुस्मृति के अनुसार हमारी सोच संसार में ब्राह्मण तैयार करने पर केंद्रित रहती तो ऐसी स्थिति कभी नहीं आती।
” जो बीत गया सो बीत गया ”
आज फिर अंतरावलोकन करने का समय है । अपने आप से अपने आप बात करने का समय है । अपने मन को टटोलने का समय है। ” जो बीत गया सो बीत गया ” – कह कर काम नहीं चलेगा। ” जो बीत गया वह लौट कर न आए- इस पर चिंतन करने से काम चलेगा। ऐसा पूरा प्रबंध करने से काम चलेगा -जिससे मनु, मनुस्मृति और मनुवाद अपने यथार्थ स्वरूप में स्थापित होकर हमारा मार्गदर्शन कर सके।
जब तक विद्यालयों में यह नहीं बताया पढ़ाया जाएगा कि मनु क्या हैं? मनुस्मृति क्या है और मनुवाद क्या है ? इनकी उपयोगिता क्या है और उनकी प्रासंगिकता क्या है ? तब तक हम मनु ,मनुस्मृति और मनुवाद के साथ ही नहीं अपने साथ भी न्याय नहीं कर पाएंगे।
मनु , मनुस्मृति और मनुवाद की वास्तविकता को लोगों के बीच परोसने और उनके हृदय में उसे उतारने का काम अकेले आर्य समाज का नहीं है। देश -काल – परिस्थिति के अनुसार मनु की सच्चाई को लोगों तक पहुंचाने का काम उन अन्य संगठनों का भी है जो अपने आप को एक हिंदूवादी संगठन के रूप में देखते हैं। जो लोग मनु ,मनुस्मृति और मनुवाद की वेद विरुद्ध व्याख्या करते हैं या उसमें की गई मिलावट को उचित मानते हैं, उनके सामने किसी भी हिंदूवादी संगठन को घुटने टेकने की आवश्यकता नहीं है। यदि घुटने टेकने का काम किया गया तो मनुस्मृति के मिलावटी माल को कूड़े में फेंकने के चल रहे अभियान को रोकना असंभव हो जाएगा।
तब उस अभियान को और भी अधिक बल मिल जाएगा जो हिंदू समाज को रूढ़िवादी मानता है और मनुस्मृति को जातिवाद का जनक कहकर शूद्र विरोधी सिद्ध करता है।
हमको श्रेष्ठ मानव समाज की रचना के लिए सभी का एक साथ आवाहन करना होगा कि सब एक साथ आएं और एक ही गुरु के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करें। पहले स्वयं अपना परिष्कार करें, फिर समाज के परिष्कार के लिए सब निकल पड़ें। हमारा यह अभियान धर्म की स्थापना के लिए होगा। जिसके लिए महर्षि मनु ने मनुस्मृति में लिखा है कि :-
धृति: क्षमा दमो ऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।। (6.92)
अर्थात् ‘ विपत्ति में धैर्य रखना, सहनशक्ति होना, मन पर नियन्त्रण, किसी के पदार्थ, धन आदि को अन्याय से न लेना, शरीर और अन्तःकरण की पवित्रता, इन्द्रियों को वश में रखना, बौद्धिक उन्नति करना, विभिन्न विद्याओं की प्राप्ति करना, सत्याचरण, क्रोधरहित अर्थात् शान्तभाव से व्यवहार करना’ ये धार्मिकता के लक्षण हैं।”
धार्मिक बनाम मजहबी
धर्म के इन लक्षणों को आत्मसात करने वाला व्यक्ति धार्मिक होता है। उसे आप मजहबी या उन्मादी नहीं कह सकते। मजहबी उन्मादी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का पहले संप्रदाय देखता है। संप्रदाय देखकर यह निश्चित करता है कि अब उसे उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ? वेद और मनुस्मृति के अनुसार मनुष्य की ऐसी सोच उसकी पाशविकता को प्रकट करती है।
इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य यही रहा है कि मनु, मनुस्मृति और मनुवाद को स्थापित किया जाए। उसकी वास्तविकता को लोगों को समझाया जाए। इसी उद्देश्य को लेकर आर्य उपप्रतिनिधि सभा जनपद गौतमबुद्ध नगर द्वारा पिछले वर्ष 2025 की 4, 5, 6अप्रैल को संसार का पहला मनु महोत्सव आयोजित किया गया था। इस पर्व को इस बार फिर 29, 30 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है।
भारतीय संविधान ,समाज और सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था पर मनु ,मनुस्मृति और मनुवाद का क्या प्रभाव है ? या क्या प्रभाव होना चाहिए ? आज यह विचार करने की आवश्यकता है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष और परीक्षा करने की आवश्यकता है। जब संस्कृति के लिए हारदिशा से नए-नए संकट दिखाई दे रहे हों, तब सबका एक साथ एक मंच पर आना बहुत आवश्यक हो गया है।
पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए डायमंड पॉकेट बुक्स के अध्यक्ष श्री नरेंद्र वर्मा जी का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता हूं। परमपिता परमेश्वर की कृपा के प्रति कृतज्ञ होकर अपने सभी परिजनों, प्रियजनों, मित्रों और पाठकों के सद्भाव और आशीर्वाद को भी नमन करता हूं।
आशा है आपको हमारा इतिहास अवश्य ही सार्थक लगेगा।
भवदीय
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
(.लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
( पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है प्राप्ति के लिए 99 11 16 99 17 पर संपर्क कर सकते हैं )
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