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रामनीति अर्थात राजनीति और राष्ट्रनीति….

जेडी न्यूज विजन…..

रामनीति अर्थात राजनीति और राष्ट्रनीति….

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भारत की वैदिक परंपराओं के ध्वजवाहक हैं। लाखों वर्ष बीत जाने के उपरांत भी संसार के करोड़ों लोग उनका नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लेते हैं। इसका कारण है कि उनके भीतर अनेक ऐसे दिव्य गुण थे जो उन्हें सबसे अलग, सबसे निराला और सबसे उत्तम बनाते हैं। उनका दिव्य भव्य व्यक्तित्व और कृतित्व ही राम-नीति है, जो आज की विकृत हो चुकी राजनीति के लिए आदर्श के रूप में काम कर सकता है। उनका यह आदर्श चरित्र ही आज की राजनीति को राष्ट्रनीति में परिवर्तित कर सकता है। जिसकी बहुत आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
जिस समय भरत अपने भाई रामचंद्र जी को वन से लौटा लाने का संकल्प लेकर उनसे मिलने वन में पहुंचे तो उस समय रामचंद्र जी ने बातों बातों में ही अपने भाई भरत को राजनीति का उपदेश दिया था। राजनीति का वह उपदेश हमारे संविधान का आदर्श होना चाहिए था। हमारी राजनीति और राष्ट्रनीति का आदर्श होना चाहिए था, परंतु हम श्रीराम के चरित्र को कहीं जीवन में स्थान नहीं दे पाए । विशेष रूप से राजनीति को हमने रामविहीन करने का संकल्प ले लिया। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमने श्रीराम के आदर्शों को न केवल भुलाने का पाप किया बल्कि वह राजनीति को कहीं छू भी न लें- इसका भी प्रयास किया गया। श्रीराम की बातों को मजहब के साथ जोड़ दिया गया और ऐसा दिखाया गया कि श्रीराम की बात राजनीति में रहकर नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा करना सांप्रदायिकता होगी।
रामचंद्र जी ने अपने भाई भारत को राजनीति का उपदेश देते हुए बताया कि आपको अपने निर्णयों की गोपनीयता का सदा ध्यान रखना चाहिए, जब तक वे लागू न हो जाएं तब तक उनकी पवित्रता और गोपनीयता भंग नहीं होनी चाहिए।
शासन स्तर पर आज भी यह बात लागू होनी चाहिए। चाहे इस बात का कितना ही विरोध किया जाए कि मोदी जी किसको राष्ट्रपति, किसको उपराष्ट्रपति , किसको किसी प्रांत का मुख्यमंत्री, किसको किसी प्रांत का राज्यपाल बनाना चाहते हैं ,इस बात की जानकारी केवल उन्हीं को होती है, – परंतु सत्य यही है कि राजनीति में इसी प्रकार की गोपनीयता होनी चाहिए। श्रीराम ने कहा था कि राजनीति में जिन लोगों को मंत्री बनाया जाए अथवा सचिव नियुक्त किया जाए, उनके बारे में यह भी जानकारी होनी चाहिए कि वह प्रमाणिक कुल में उत्पन्न हैं, यानी किसी विशेष परीक्षा पास किए हुए व्यक्ति को आप कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं दे सकते। जब तक कि उसके देशभक्त परिवार की पृष्ठभूमि का आपको ज्ञान न हो। स्वतंत्रता के पश्चात हमने अनेक ऐसे लोगों को देखा जो देशभक्त परिवारों से संबंध नहीं रखते थे, परन्तु ऊंचे पदों तक पहुंच गए और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए या उसके बाद भी देश विरोधी बयान देने या कार्य करने में उन्होंने संकोच नहीं किया। रामनीति का यह आदर्श आज की राजनीति के लिए राष्ट्रनीति परक हो सकता था। आगे रामचंद्र जी कहते हैं कि भरत तुम्हें हजारों मूर्खों के मत की अपेक्षा एक विद्वान के मत का सम्मान करना चाहिए अर्थात राजनीति में रहते हुए उन लोगों के मत का कोई मूल्य नहीं होता जो एक बोतल शराब में अपना ‘ मत ‘ बेच देते हैं। बात साफ है कि जो लोग एक बोतल में अपना मत बेचने की सोच रखते हैं, उनके द्वारा भेजे गए लोग ही जनप्रतिनिधि बनकर देश बेचने का काम करते हैं। यदि रामचंद्र जी के इस मत का अथवा उनकी रामनीति के इस आदर्श का वर्तमान संदर्भ में अवलोकन किया जाए अथवा इसकी व्याख्या की जाए तो जिन लोगों ने कश्मीर से हिंदुओं को भगाया, इसके पीछे उनका उद्देश्य एक ही रहा कि यदि कल को यहां पर जनमत संग्रह की बात की जाएगी तो उस समय सारे देश विरोधी कश्मीरवासी भारत के विरुद्ध मत देने की क्षमता रख सकेंगे। वर्तमान संविधान की व्यवस्था है कि यदि लाखों देशद्रोही एकमत के हों तो उनके ऊपर चाहे कितना ही बड़ा देशभक्त और विद्वान क्यों न बैठा हो, उसका मत भी कोई अर्थ नहीं रखेगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में यदि रामचंद्र जी की रामनीति को लागू किया जाता तो पहली बात तो यह थी कि कश्मीर से हिंदुओं का पलायन ही नहीं होने दिया जाता और यदि किसी कारण से फिर भी हो गया होता तो देशद्रोही नागों को अपनी करतूत दिखाने का अवसर नहीं दिया जाता। वर्तमान राजनीति को इस ओर सोचने की आवश्यकता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मत केवल विद्वानों का होता है। क्योंकि उनके पास एक सुव्यवस्थित मर्यादित मति होती है और जिसके पास मति होती है वही मत देने का अधिकारी होता है। उनकी मति किसी भी दृष्टिकोण से कभी विचलित नहीं हो सकती। संसार का बड़े से बड़ा लालच भी उन्हें विचलित नहीं कर सकता। वयस्क मताधिकार के आधार पर हमारे देश में जिस प्रकार राष्ट्रहितों के विरुद्ध कार्य किया गया है,उसने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि रामनीति के विपरीत जाओगे तो परिणाम खतरनाक आने निश्चित हैं।
रामचंद्र जी का उपदेश रहा कि सेनानायक ऐसे व्यक्ति को बनाया जाए जिसने अपना पराक्रम दिखाया हो। जिसकी राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध हो और जिसने रणक्षेत्र में विशेष कार्य करते हुए अपना शौर्य व्यक्त किया हो। उनका उपदेश था कि जिन लोगों ने मातृभूमि के प्रति समर्पित होकर अथवा अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों का ध्यान रखते हुए कोई विशेष शौर्य पूर्ण कार्य किया हो, उनको राजा विशेष अवसरों पर सम्मानित करे। आज हम ऐसे लोगों को वीर चक्र, महावीर चक्र और परमवीर चक्र देकर सम्मानित करते हैं। परंतु यह व्यवस्था इसके उपरांत भी पूर्णतया पारदर्शी नहीं है। विशेष रूप से अंग्रेजों और कांग्रेस के जमाने में अनेक ऐसे देशभक्त सैनिकों अथवा सुरक्षा बलों के वीरों को अथवा देशभक्ति लोगों को अपमानित किया गया, जिन्होंने आतंकवादियों के विरुद्ध हथियार उठाए थे। अंग्रेजों के जमाने में यह सब होता रहा ,यह बात तो समझ में आ सकती है परंतु कांग्रेस ने भी इस नीति को यथावत जारी रखा और जिन लोगों ने देशविरोधी आतंकियों को कुचलने का काम किया था, उन्हें मानवता के विरुद्ध अपराध अथवा मानवधिकारों का उल्लंघन करने के अपराध में जेल में डाल दिया। यह न तो राम नीति थी और न ही राष्ट्र नीति थी। इसे आप अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए की गई राजनीति अवश्य कह सकते हैं। रामनीति और राष्ट्र नीति में इस प्रकार की सोच को कदापि स्वीकार नहीं किया सकता।
हमने रामलीलाए की हैं, रासलीलाएं भी की हैं। परंतु रामलीलाओं और रासलीलाओं में अपने महापुरुषों के उस यौद्धेय स्वरूप को प्रकट करने का कार्य नहीं किया जो राष्ट्र के लिए उपयोगी हो सकता था। आज की राजनीति के लिए यह अंतर मंथन का विषय है कि वह राजनीति को अपनाए या राष्ट्रनीति की विचारक रामनीति को।

(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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