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धूप से मुरझाये पौधे के लिए थोड़ा सा जल जीवनदायी बन जाता है- आचार्य विनोद जी महाराज…

जेडी न्यूज़ विज़न….

…सन्तोष कुमार गुप्ता….

*तीयर बरईठ चौराहा गोरखपुर में आयोजित भागवत महापुराण कथा में कथाव्यास आचार्य श्री विनोद जी महाराज ने कहा,धूप से मुरझाए पौधे के लिए थोड़ा सा जल जीवनदाई बन जाता है, एवं नैराश्य की आँच से संतप्त व्यक्ति के लिए थोड़ा सा सहारा प्राणदायी बन जाता है,मनुष्य को उस ईश्वर ने एक सामाजिक प्राणी बनाया है। समाज में घट रही प्रत्येक अच्छी-बुरी घटना के प्रति संवेदनशील रहना ही हमें और अधिक सामाजिक बनाता है। अपने साथ-साथ समाज में रह रहे अन्य लोगों की वेदनाओं की चुभन हमारे हृदय में भी होनी ही चाहिए। सामाजिक प्राणी होने का अर्थ केवल इतना नहीं कि मनुष्य समाज के बीच में रहता है अपितु यह है कि समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को साथ लेकर चलने की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए। जो लोग निराशा में, विषाद में अथवा तो अभाव में अपना जीवन जी रहे हैं अपनी सामर्थ्यानुसार उनसे जुड़े रहना ही हमें और अधिक मानवीय बनाकर एक स्वस्थ समाज के नवनिर्माण में अपना योगदान देता है । प्रयास यह होना चाहिए कि हम सदैव समाधान का भाग बने समस्या का नहीं। मनुष्य को कभी अपने संस्कार नहीं भूलना चाहिए, किसी के मिलते ही निर्णय ना किया करो, क्योंकि मनुष्य परतों में खुलता है। मोह अधिक हो जाये तो बुराई नहीं दिखती और यदि घृणा अधिक हो जाये तो अच्छाई दिखाई नहीं आती। पानी से तस्वीर कहाँ बनती है सपनों से भाग्य कहाँ बनता है किसी भी संबंध को सच्चे ह्रदय से निभाओ क्योंकि यह जीवन फिर कहाँ मिलता है। कड़वी बातें बोलने का साहस बहुत लोगों में होता है लेकिन कड़वी बातें सुनने की क्षमता बहुत कम लोगों में होती है। कोई मनुष्य भले ही प्रतिवाद ना करे, लेकिन हर बात का मूल्यांकन अवश्य करता है। विचारों में गहराई से ही, व्यक्तित्व में सादगी आती है। यदि चश्मा बदलने से हमारी दृष्टि बेहतर होती है, तो विचारों में बदलाव से हमारा जीवन ही अच्छा होगा, विचारों की सुन्दरता, दृष्टियों को और सुन्दर कर दिया करते हैं। क्रोध यदि ह्रदय से निकल कर जिह्वा पर आ जाता है तो सारी मर्यादा भूल जाता है, वहीं यदि मस्तिष्क में चला जाये तो केवल मंथन से उसका आवेग कम हो जाता है । विचलित मत होना || अपने मन का अवलोकन करते हुए श्रेष्ठ के लिए सदैव संकल्पित रहें। पीठ पीछे होने वाली बातों पर ज्यादा ध्यान मत दीजिए, क्योंकि जब लोग बराबरी नहीं कर सकते तो बुराई करने लग जाते हैं। पीठ पीछे आपकी बातें होने लगे तो व्यर्थ की बातों में विचलित होने की अपेक्षा ये समझ जाना कि आप उनसे दो कदम आगे हैं क्योंकि बातें भी उसी की होती है, जिसमें कोई बात होती है। प्रशंसा आपको अहमता से भर देगी और बुराई आपको सावधान करते हुए स्वयं के जीवन को निहारने का अवसर प्रदान करेगी। छोटी-छोटी बातों को अनदेखा करके ही बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकता है। पीठ पीछे बोलने वालों की परवाह कभी मत करो, लेकिन अपने कर्म की पवित्रता और लक्ष्य की श्रेष्ठता का ध्यान सदैव रखो। आपके प्रयास बुराई करने वालों को चुप कराने के लिए नहीं अपितु स्वयं के जीवन से बुराई मिटाने की दिशा में होने चाहिए ।।*

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