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सुकून की तलाश
(फर्स्ट एडिटर)
अंदाज़-ए-बयां है, पर चैन-ए-सुख़न कहाँ?
बाहर तपन है ऐसी, कि ख़्वाब जल रहे,
उमड़ रहे हैं विचार, पैर पटककर चल रहे।
कुछ हाँफ रहे, लगता है सांस टूटेगी अभी,
क्या आँखों का पानी पिलाया है तुमने?
थपकी देकर, क्या सहलाया है तुमने?
सूर्य के प्रचंड तेज़ से, खंड-खंड हैं विचार,
इन्हें जोड़कर ‘शब्दों का महल’ खड़ा करना—
जैसे भरी धूप में, सूखे कुएं से जल भरना।
बरबस ही मुझको अब चलना पड़ता है,
न भीतर सुकून, न बाहर कहीं चैन है,
ढूंढते फिरते उसे, ये दिन-रात जागते नैन हैं।
– मदन वर्मा माणिक
इंदौर, मध्यप्रदेश
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