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वक्त का तकाज़ा
उसकी समझ में आया नहीं था,
मिन्नतें बहुत की थीं बाद में,
पर पहले उसने बुलाया नहीं था।
वो साथ जो अपना बन सकता था,
उसने कभी वो निभाया नहीं था।
जब राहें जुदा और दिल दूर हुए,
तब हाल हमारा पूछा उसने,
जब हम थक कर मजबूर हुए।
पर सोया नसीब जगाया नहीं था,
क्योंकि पहले उसने बुलाया नहीं था।
अब पछतावे के दीप जलाने से क्या,
गई हुई बहारों को बुलाने से क्या?
जब प्यास लगी थी लब सूखे थे,
तब अमृत उसने पिलाया नहीं था।
खामोश खड़े थे हम दर पर उसके,
पर हाथ उसने बढ़ाया नहीं था।
मिन्नतें अब बेअसर सी लगती हैं,
ये यादें भी अब जहर सी लगती हैं।
उसने खो दिया जो पा सकता था,
पर पहले उसने बुलाया नहीं था।
– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश
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