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शिक्षित समाज में बढ़ती पारिवारिक त्रासदियाँ: आखिर गलती कहाँ हो रही है?….

जेडी न्यूज विजन….

(रमेश शंकर पाण्डेय)
दिल्ली के कड़कड़डूमा न्यायालय से जुड़ी एक अत्यंत दुखद घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। जानकारी के अनुसार न्यायिक अधिकारी अमन कुमार शर्मा ने अपनी पत्नी स्वाती से विवाद के बाद आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लिया। बताया जा रहा है कि पारिवारिक हस्तक्षेप और लगातार चल रहे तनाव ने इस त्रासदी को जन्म दिया। यह केवल एक परिवार की निजी घटना नहीं है, बल्कि आधुनिक शिक्षित समाज के भीतर पनप रहे मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट का गंभीर संकेत भी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब उच्च शिक्षित, कानून के जानकार और प्रतिष्ठित परिवारों में भी रिश्ते इतने कमजोर होते जा रहे हैं, तो सामान्य परिवारों की स्थिति क्या होगी? आज समाज में शिक्षा का स्तर तो बढ़ा है, लेकिन क्या संस्कार, सहनशीलता और पारिवारिक समझ भी उसी अनुपात में विकसित हुई है? शायद नहीं।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने लोगों को सफल पेशेवर तो बनाया है, लेकिन संवेदनशील इंसान बनाने में कहीं न कहीं कमी रह गई है। आज डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, आर्थिक सम्पन्नता बढ़ रही है, लेकिन धैर्य, त्याग, संवाद और रिश्तों को निभाने की क्षमता लगातार कमजोर होती जा रही है। पति-पत्नी के बीच छोटे-छोटे विवाद अब अहंकार का रूप ले लेते हैं और परिवारों का अनावश्यक हस्तक्षेप हालात को और अधिक जटिल बना देता है।
धनाढ्य और उच्च शिक्षित परिवारों में एक नई समस्या तेजी से उभर रही है—“अत्यधिक हस्तक्षेप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का टकराव।” कई बार माता-पिता, भाई-बहन या रिश्तेदार वैवाहिक जीवन में इस हद तक दखल देने लगते हैं कि पति-पत्नी के बीच विश्वास और संवाद समाप्त होने लगता है। परिणामस्वरूप मानसिक तनाव बढ़ता है और कई बार व्यक्ति अवसाद में चला जाता है।
आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज अब भी खुलकर बात नहीं करता। विशेषकर पुरुषों की मानसिक पीड़ा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे हर परिस्थिति में मजबूत बने रहें। लेकिन भीतर ही भीतर टूटता हुआ व्यक्ति कब आत्मघाती कदम उठा ले, इसका अनुमान लगाना कठिन होता है।
यह भी सच है कि आधुनिक जीवनशैली में “मैं” की भावना “हम” पर भारी पड़ती जा रही है। रिश्तों में समर्पण कम हो रहा है और अधिकारों की लड़ाई अधिक दिखाई देती है। सोशल मीडिया और दिखावटी जीवन ने भी लोगों के भीतर असंतोष और तुलना की मानसिकता को बढ़ाया है। ऐसे में छोटी समस्याएँ भी विकराल रूप ले लेती हैं।
यह घटना समाज और सरकार दोनों के लिए चेतावनी है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों, पारिवारिक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और संवाद कौशल को भी उतना ही महत्व दिया जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में केवल रोजगारपरक शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जानी चाहिए।
परिवारों को भी यह समझना होगा कि विवाह दो व्यक्तियों का संबंध है, जिसमें सहयोग की आवश्यकता होती है, नियंत्रण की नहीं। रिश्तों को बचाने के लिए संवाद, धैर्य और पारस्परिक सम्मान सबसे आवश्यक हैं।
यदि समाज ने समय रहते इन संकेतों को नहीं समझा, तो शिक्षित और सम्पन्न परिवारों में बढ़ती ऐसी त्रासदियाँ आने वाले समय में और भयावह रूप ले सकती हैं। शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह इंसान को केवल सफल नहीं, बल्कि संवेदनशील, संतुलित और संस्कारित भी बनाए।

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