जेडी न्यूज़ विज़न…..
मनुस्मृति और भारतीय संविधान – भाग – 14
राजा की जीवनचर्या और हमारा संविधान
हमारे वर्तमान संविधान में कहीं पर भी राजा अर्थात प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति की दिनचर्या पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया है। इसके विपरीत एक मिथक गढ़ा गया है कि नेता सायं के 8:00 के बाद प्रातः काल सूर्योदय तक क्या करते हैं ? – इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा। क्योंकि यह उनका व्यक्तिगत समय है । महर्षि मनु की मान्यताओं के अनुसार राजा अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में जीवन यापन करने वाले किसी भी व्यक्ति का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं होता। उसका पल-पल अपनी प्रजा के लिए होता है। जीवन का हर पल सार्वजनिक होता है। उसके जीवन के हर पल पर उसकी प्रजा का अधिकार होता है। जब चाहे प्रजा अपनी पीड़ा सुनाने के लिए उसके पास आ सकती है और उस पीड़ा का निदान करना राजा के लिए अनिवार्य होगा। इसलिए जहां हमारे वर्तमान संविधान में राजा की जीवनचर्या पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया है, वहीं महर्षि मनु ने इस विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि राजा को प्रातः काल उठकर ज्ञानी , तपस्वी महात्माओं अर्थात पारंगत आचार्य आदि विद्वान ब्राह्मणों को अभिवादन आदि से उनका सत्कार कर उनकी संगति प्राप्त करनी चाहिए। उनके साथ रहकर सत्संग करना चाहिए। जिससे राजा की सात्विक वृत्तियां जीवंत बनी रहें और वह अत्यधिक ऊर्जा से भरकर जन सेवा के अपने महान कार्य को और भी अधिक तीव्रता के साथ संपादित कर सके। इस प्रकार की सत्संगति से राजा के भीतर कभी तमोगुण का प्रकोप नहीं होगा।
राजा और विद्वान लोग
महर्षि मनु ने कहा है कि राजा को ऐसे उत्तम वैदिक शिक्षक और विद्वानों के मार्गदर्शन और मर्यादा में रहकर ही अपने सारे कार्य करने चाहिए। कई लोगों ने इस प्रकार की व्यवस्थाओं को ब्राह्मणवाद कहकर उनकी आलोचना की है। जबकि यह किसी जाति विशेष के लोगों के लिए न कहकर विद्वान लोगों के लिए कहा गया है कि ऐसे विद्वानों की संगति करना राजा के लिए आवश्यक है । ऐसे विद्वानों की संगति से राजा को अपने राजकार्यों के संपादन में सुविधा होती है। यह विद्वान इतने पहुंचे हुए होने चाहिए कि उनकी भावनाओं में तनिक भी राग द्वेष का दोष न हो, उनकी चित्ति , उक्ति और कृति में समरूपता हो , मन वचन और कर्म में एकरूपता हो, जो कहते हों, वही करते हों। ऐसे विद्वानों की सत्संगति प्रकार राजा अपनी प्रजा के कल्याण में निरंतर लगा रहेगा। उसकी यह राष्ट्र साधना ही उसका राजधर्म कहलाता है।
यह केवल महर्षि मनु से ही अपेक्षा की जा सकती थी कि वह राजा की जीवनचर्या को भी अपने विधान के अंतर्गत सम्मिलित करें । क्योंकि जब कोई बड़ा लक्ष्य प्राप्त किया जाता है तो उसके लिए छोटे-छोटे बिंदुओं को भी दृष्टि में रखा जाता है और जीवनचर्या को संतुलित मर्यादित बनाकर चलना छोटी-मोटी बात नहीं है। हमारे जीवन का बनना बिगड़ना हमारी जीवन चर्या पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति ऐसा होता है जो सुबह से शाम तक बदमाशी की गतिविधियों में लगा रहता है। जीवनचर्या तो उसकी भी होती है। वह भी यह सोचकर चलता है कि आज किस-किस बदमाश से किस-किस बदमाशी के लिए बातें करनी हैं ? और कहां-कहां पर बदमाशी करके घर को लौटना है ? इसके विपरीत एक ऐसा साधु या संन्यासी भी होता है जो नित्य प्रातः काल उठकर भगवान का भजन करता है। उससे प्रार्थना करता है कि मैं दिन भर जितने भी कार्य करूं उनसे सबका कल्याण होना चाहिए। वह भी अपने घर से निकलता है, उसकी भी अपनी जीवनचर्या होती है। वह भी सोच कर चलता है कि आज कितने प्राणियों का कल्याण करना है ? शाम को लौटकर वह भी गुणा भाग लगाता है कि आज की जीवनचर्या कितनी सार्थक रही ?
राजा के 24 घंटे स्वर्ग समान हों
बदमाश और साधु दोनों के पास ही 24 घंटे का वही समय था जो हर व्यक्ति के पास होता है । परंतु एक ने उसे नर्क बना दिया, दूसरे ने उन्हीं 24 घंटे को स्वर्ग बना दिया। बस, यही बात हमें जीवनचर्या के संबंध में ध्यान में रखनी चाहिए। महर्षि मनु की मान्यता है कि राजा को अपने प्रतिदिन के 24 घंटों को स्वर्ग बनाने पर ध्यान देना चाहिए। वह जितना ही अधिक अपने 24 घंटे के समय को स्वर्ग बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा, उतना ही राष्ट्र का कल्याण होगा अर्थात राष्ट्र स्वर्ग बनेगा।
हमारे संविधान में यह कमी रही है कि हमने अपने जनप्रतिनिधियों की जीवनचर्या निर्धारित नहीं की है । उनके लिए उन मर्यादाओं का निर्धारण नहीं किया जिनसे वे सात्विक बुद्धि वाले होकर राष्ट्र की उन्नति के लिए 24 घंटे राष्ट्र साधना के अपने पवित्र कार्य में लगे रहते । आपको अपने देश में अनेक जनप्रतिनिधि ऐसे मिलेंगे जिन्हें अपने कार्य की प्राथमिकताएं निर्धारित करना तक नहीं आता। प्रत्येक कार्य के लिए वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर निर्भर रहते हैं। कितने ही अधिकारी यहां तक कि न्यायालयों में काम करने वाले न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या न्यायिक अधिकारी भी आपको इस प्रकार के मिलेंगे जो अपने लिपिक से पूछ कर आदेश तैयार करते हैं या अपने सरकारी कामों को निपटाते हैं।
अनेक राजनीतिक दलों के नेता यह हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जिनकी जीवनचर्या पूर्णतया अस्त-व्यस्त रहती है। देर सवेर घर पहुंचना देर सवेर सुबह उठना और फिर क्षेत्र के लिए निकल जाना या और अपने दूसरे राजनीतिक कार्यों में व्यस्त रहना ( जिनका जनता से कोई संबंध नहीं होता अर्थात पार्टी आदि की बैठक में जाना ) अथवा अपने-अपने कामधंधे में मुनाफा कमाने में लगे रहना। ऐसे जनप्रतिनिधियों की सोच सामान्य रूप से इस प्रकार की होती है कि वह अपने आपको जनप्रतिनिधि के विशेष अधिकार प्राप्त कर अधिकारियों पर अपने प्रभाव का अनुचित प्रयोग करते हैं और कामधंधे में अधिक मुनाफा कमाने पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जनप्रतिनिधि कहे जाने के योग्य नहीं होते।
राजा, आमात्य और आचार्य
महर्षि मनु कहते हैं कि राजा को विद्वान पुरुषों की संगति में रहकर अपनी बुद्धि का विकास करना चाहिए। उसकी बुद्धि में जंग नहीं लगना चाहिए। आचार्य आदि गुरुजन और अमात्य वर्ग राजा की मर्यादा को निर्धारित करने का काम करें । उसे पग पग पर यह बताते रहें कि उसके द्वारा अमुक कार्य के करने से जनकल्याण होगा और अमुक कार्य के करने से राष्ट्र का अकल्याण होगा । वही राजा को गलत कामों से रोकते रहें । राजा के कौन से कार्य करणीय हैं और कौन से अकरणीय हैं ,इस पर अपना ध्यान केंद्रित करें और उनसे राजा को यथा समय अवगत कराते रहें। जैसे आचार्य के निर्देशन में शिष्य, पिता के निर्देशन में पुत्र, स्वामी के निर्देशन में सेवक चलता है, उसी प्रकार अपने ऋत्विक के निर्देशन में राजा को चलते रहना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि जैसे प्रत्येक शिष्य को अपने आचार्य के निर्देशन पर विश्वास होता है, प्रत्येक पुत्र को अपने पिता के निर्देशन पर विश्वास होता है और प्रत्येक सेवक को अपने स्वामी के निर्देशन पर विश्वास होता है, उसी प्रकार राजा को भी अपने ऋत्विक के निर्देशन पर विश्वास करके चलना चाहिए।
मनु ने राजा के लिए स्पष्ट किया है कि उसे उन शुद्ध आत्मा वाले वेद के ज्ञाता, ज्ञान और तपस्या में पारंगत विद्वानों की प्रतिदिन सेवा करनी चाहिए अर्थात उनका आदर, सत्कार और संगति करनी चाहिए । क्योंकि सदैव ज्ञान आदि से बढ़े -चढ़े विद्वानों की सेवा करने वाले राजा का राक्षस अर्थात विरोधी भी आदर करते हैं अर्थात मर्यादाओं व्यवस्थाओं को भंग करने वाले पाप कर्मकारी राक्षस भी उस राजा का सम्मान करते हैं और उससे भयभीत होकर वश में रहते हैं। फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है ? वह तो स्वत: वशीभूत रहेंगे।
सही समय पर विद्वानों की संगति प्राप्त करे
यहां पर स्पष्ट किया गया है कि राक्षसों अथवा विरोधियों को भी यदि वश में करना है तो राजा को विद्वानों की प्रतिदिन सेवा करनी चाहिए। सेवा का अभिप्राय यह नहीं है कि राजा प्रातः काल में उनके पास जाए और उनके पैर दबाकर वहां से चला आए ? इसका अभिप्राय है कि राजा सही समय पर ऐसे विद्वानों की संगति प्राप्त करे। उनका आदर सत्कार करे और उनसे शासन को सुव्यवस्थित चलाने के लिए गंभीर चर्चा करता रहे, धर्म की चर्चा करे,शास्त्रों की चर्चा करे,नैतिकता और मर्यादा की चर्चा करे। इसके अतिरिक्त धर्म चर्चा करे। इन सब प्रकार की चर्चाओं का लाभ यह होगा कि राजा स्वयं चरित्रभ्रष्ट अथवा पथ भ्रष्ट नहीं होगा। वह अपने कार्य और अपने धर्म को पहचान कर निरंतर उसकी साधना में लगा रहेगा।
मनु के अनुसार लोक कल्याण के प्रति संवेदनशील राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह चाहे स्वयं में कितना ही राजनीतिक अनुशासन रखने वाला क्यों न हो, और कितना ही मर्यादाओं में चलने वाला भी क्यों न हो, तो भी उसे राज्य के निवासियों के कल्याण के लिए वैदिक विद्वानों गुरुजनों से प्रतिदिन अनुशासन और मर्यादा की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। कहा जाता है कि ‘ सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ इसी के दृष्टिगत महर्षि मनु राजा के लिए बार-बार यह कह रहे हैं कि उसे विद्वानों की संगति करते रहना चाहिए। राजा को ऐसे विद्वानों की संगति में अपने सेवकों और राज्यसभा सदस्यों को भी साथ में रखना चाहिए। जिससे उन्हें भी राजनीतिक अनुशासन में रहने का ढंग आ सके। वे अपने आप को मर्यादा में ढाल सकें।
मनु की स्पष्ट मान्यता है कि अनुशासन में रहने वाला और नीति जानने वाला राजा कभी विनाश को प्राप्त नहीं करता।
नीति का अभिप्राय ही धर्म से है। एक निश्चित व्यवस्था को ही नीति कहते हैं। जिसमें हर कदम पर मर्यादा होती है। अनुशासन होता है। नैतिकता होती है । धर्म होता है। मानवता होती है । यदि कोई राजा अपने आप को मर्यादा, अनुशासन, नैतिकता, धर्म और मानवता में ढाले रखता है तो उसका राज्य कभी विनाश को प्राप्त नहीं होता। इसके विपरीत एक स्वेच्छाचारी राजा अवश्य विनष्ट हो जाता है । क्योंकि उसकी नीतियों में मर्यादाहीनता, अनुशासनहीनता, अनैतिकता, अधर्म और दानवता होती है। विद्यावान और अनुशासन की मर्यादा में रहने वाला एवं नीति को जानने वाला तथा प्रजा के हित में तत्पर राजा ही संपूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है। संपूर्ण भूमंडल का सारा वैभव उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता है। शीश झुका के खड़ा रहता है। यदि राजा में अनुशासनहीनता है, मर्यादाहीनता है, अधर्म और अनैतिकता है तो ऐसे राजा के होने से राजा का न होना अच्छा है।
तीन वेदों की विद्याओं के ज्ञाता विद्वान और राजा
राज्यसभा सदस्यों और सेवकों सहित राजा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद रूप तीन वेदों की विद्याओं के ज्ञाता विद्वानों से तीनों विद्याओं को और सनातन दंड विद्या को और न्याय विद्या को अध्यात्मविद्या को और जनता से राज्य के लिए आवश्यक व्यवसायों का आरंभ करना सीखे और राज्य संबंधी समाचार जाने।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने महर्षि मनु के इस श्लोक का अर्थ करते हुए ( सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 6 में ) लिखा है कि ” राजा और राज्यसभा के सभासद तब हो सकते हैं कि जब वह चारों वेदों की कर्म , उपासना, ज्ञान विद्याओं के जानने वालों से तीनों विद्या, सनातन दंडनीति, न्यायविद्या, आत्म विद्या अर्थात् परमात्मा के गुण- कर्म- स्वभाव रूप को यथावत जानने रूप ब्रह्म विद्या और लोक से वार्ताओं का आरंभ सीखकर सभासद या सभापति हो सकें। ”
हमारा संविधान और नैतिक व्यवस्थाएं
हमारे संविधान में राजा के लिए अथवा देश के राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री के लिए कहीं पर भी यह प्रावधान नहीं किया गया है कि वह अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए सदैव सचेष्ट और जागरूक रहें। जबकि महर्षि मनु स्पष्ट कहते हैं कि राजा को अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए सदैव सचेष्ट रहना चाहिए। महर्षि मनु कहते हैं कि राज्यसभा सभासदों,सेवकों सहित राजा दिन रात इंद्रियों को वश में रखने के लिए प्रयासरत रहे। क्योंकि इंद्रियों को वश में रख सकने वाला राजा ही प्रयोजन को वश में अर्थात शासन में रखने वाला हो सकता है।
यदि राजा स्वयं लंपट है, व्यभिचारी है और इंद्रियों के पीछे दौड़ता है, उनके विषयों में डूबा रहता है तो ऐसे राजा को देखकर उसकी प्रजा भी ऐसे ही भ्रष्ट आचरण में डूब जाएगी। जिससे राष्ट्र नष्ट हो जाएगा। इस व्यवस्था का नाम ही मनुस्मृति की धर्म व्यवस्था है। मनु की यह धर्म व्यवस्था देखने में तो बड़ी सरल सी नजर आती है परंतु इसका पालन करना बड़ा कठोर होता है। पालन करना ही हमारे लिए एक साधना होती है, जो कोई उसे साधना में जितना ऊंचाई को प्राप्त कर लेता है ,वह उतना ही दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है।
महर्षि दयानंद जी इस श्लोक का अर्थ करते हुए लिखते हैं कि ” जब सभासद और सभापति इंद्रियों को जीतने अर्थात अपने वश में रखकर सदा धर्म में बरतें और धर्म से हटे हटाए रहें , इसलिए रात दिन नियत समय में योगाभ्यास भी करते रहें ,क्योंकि जो जितेंद्रिय की अपनी इंद्रियों – मन , प्राण और शरीर प्रजा है , इसको जीते बिना बाहर की प्रजा को अपने वश में स्थापना करने को समर्थ कभी नहीं हो सकता।” ( सत्यार्थ प्रकाश स. 6)
स्वामी दयानंद जी महाराज जी की स्पष्ट मान्यता थी कि मनुष्य को सबसे पहले आत्म विजय करनी चाहिए। जो आत्म विजय कर लेता है, वह संसार की बड़ी से बड़ी बाधा को पार कर जाता है।
क्रोधज और कामज दोष
महर्षि मनु ने सभी सभासदों और सेवकों सहित राजा को काम से उत्पन्न होने वाले मृगया आदि दस तथा क्रोध से उत्पन्न होने वाले पैशुन्य आदि आठ कठिन व्यसनों को प्रयत्न करके छोड़ देने का परामर्श दिया है। उनका मानना है कि राजा को इस प्रकार के व्यसनों से दूर रहना चाहिए।
मनु कहते हैं कि शिकार खेलना, अक्ष अर्थात चौपड़, जुआ आदि खेलना, दिन में सोना, काम-कथा अथवा दूसरों की निंदा करना, स्त्रियों का संग करना, मादक द्रव्य जैसे मद्य, अफीम, भांग, गांजा , चरस आदि का सेवन करना, गाना, बजाना, नाचना और नाच करना और देखना , व्यर्थ ही इधर-उधर घूमते रहना, ये 10 काम से उत्पन्न होने वाले व्यसन हैं।
मनु जी की सूक्ष्म बुद्धि को दाद देनी होगी। बहुत सूक्ष्मता से उन्होंने काम से उत्पन्न होने वाले इन 10 व्यसनों की ओर संकेत किया है। संकेत ही नहीं किया, उनका स्पष्ट उल्लेख भी किया है। राजा, राज्यकर्मचारी और राजा के सेवकों से अपेक्षा की है कि वे इन सबकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखें। काम से उत्पन्न होने वाले इन व्यसनों से मुक्त रहने के लिए कठिन साधना करनी होती है। जब महर्षि मनु इस प्रकार के व्यसनों से बचने की बात कह रहे हैं तो इसका अभिप्राय है कि वह राजा को कठोर साधना में ढालने की बात कह रहे हैं।
पैशुन्य व्यसन क्रोधज होते हैं। जिनमें चुगली करना , सभी दुस्साहस के व्यवहार, द्रोह रखना, दूसरे की बड़ाई या उन्नति देखकर जला करना, असूया अर्थात दोषों में गुण और गुणों में दोषारोपण करना, अधर्म युक्त बुरे कामों में धन आदि का व्यय करना, कठोर वचन बोलना और बिना अपराध के कड़ा वचन बोलने या अति कठोर दंड देना अथवा बिना अपराध के दंड देना- ये आठ दुर्गुण क्रोध से उत्पन्न होते हैं।
मनुष्य की बौखलाहट और समाज
इन सभी व्यसनों से मनुष्य पागल सा हुआ रहता है। वह कभी भी नीति, मर्यादा, अनुशासन अथवा नैतिकता के दायरे में रहकर काम करने के लिए अपने आप को सहज अनुभव नहीं करता। वह जहां भी जाता है वहीं पर आग लगा देता है।
कभी-कभी तो वह स्वयं भी नहीं समझ पाता कि लोग उसके बारे में ऐसा क्यों कहते हैं कि वह जहां भी जाता है वहीं आग लगा देता है ? इसका कारण यह होता है कि आग लगाने की प्रवृत्ति उसके भावों और विचारों में इतनी अधिक घुल मिल जाती है कि वह स्वयं भी नहीं समझ पाता कि गलती मुझसे होती है या अगले वाले से होती है ? उसकी बौखलाहट समाज के लिए भारी पड़ती है। इसलिए लोग उससे बचने लगते हैं । संसार में जितने भर भी बड़े-बड़े तानाशाह हुए हैं, वह सभी काम और क्रोध से जन्म लेने वाले इसी प्रकार के व्यसनों में फंसकर हताशा का शिकार होकर चाहे कुछ देर राज करने में सफल हो गए हों परंतु जितनी देर राज करते रहे उतनी ही देर संसार में पाप कर्म भी करते रहे। दूसरों के धन को हड़पते रहे, दूसरों के राज्यों को हड़पने की चेष्टा करते रहे, दूसरों को मिटाने के लिए बड़ी-बड़ी सेनाओं अथवा लूट दलों को बनाकर क्रोधी सर्प की भांति फुंकारते हुए सेना ले जाकर दूसरे राजा पर जा चढ़े , दूसरे लोगों की बहन बेटियों के साथ दुर्व्यवहार करते रहे। इस प्रकार वे स्वयं राजा होकर अराजक बने रहे।
राजा के लिए मनु कहते हैं कि जो राजा काम से उत्पन्न हुए दस व्यसनों में फंसता है, वह अर्थ अर्थात राज्य, धन आदि और धर्म से रहित हो जाता है। जिस राज्य को उसके पूर्वजों ने विस्तार दिया था, वह राज्य नष्ट होने लगता है। जिस धन से उसने या उसके पूर्वजों ने खजाने को भरा था, वह खजाना भी खाली होने लगता है और जिस धर्म की रक्षा उसने या उसके पूर्वजों ने कभी बड़े यत्न से की थी, वह भी नष्ट होने लगता है। जो राजा क्रोध से उत्पन्न हुए आठ बुरे व्यसनों में फंसता है वह जीवन से ही हाथ धो बैठता है। यही कारण है कि वेद ने भी राजा के जितेंद्रिय होने की बात कही है। वेद का कहना है कि राजा जितेंद्रिय अर्थात ब्रह्मचारी रहकर ही तपस्या से राष्ट्र की रक्षा कर सकता है। प्रजा को वश में कर सकता है।
ब्रह्मचारीसूक्त
अथर्ववेद का ग्यारहवें काण्ड का पाँचवाँ सूक्त ब्रह्मचर्य्य के लिये ही समर्पित है। इसमें तरह-तरह से ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णित है। इस सूक्त को पढ़ने से पता चलता है कि हमारे पूर्वज ब्रह्मचर्य साधना के प्रति कितने समर्पित रहे ? ब्रह्मचर्य का लाभ क्या है ? और ब्रह्मचर्य की साधना आज के समय के लिए कितनी आवश्यक हो गई है ?
ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥ — (अथर्ववेद 11.5.17)
अर्थ– जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है।
ब्रह्मचर्य की साधना से निकलते हुए जो युवा गृह आश्रम में प्रवेश करते हैं, उनका गृहस्थ भी सफल होता है, उसमें तनाव लेशमात्र भी नहीं होता।
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥
— (अथर्ववेद 11.5.18)
अर्थ– ब्रह्मचर्य की साधना करने वाला ब्रह्मचारी दूसरे लोगों के लिए अजेय होता है। उसे पर विजय प्राप्त करना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। वेद कह रहा है कि वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।
आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥
— (अथर्ववेद 11.5.19)
अर्थ– पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। इस वेद मंत्र से स्पष्ट हो रहा है कि राजा भी राजा बनने से पहले वेद विद्या में पारंगत होना चाहिए।आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है।”( साभार)
अंबेडकर और संविधान के आरक्षण संबंधी प्राविधान
डॉ कृष्ण वल्लभ पालीवाल लिखते हैं :- ” डॉ० साहब ( डॉ भीमराव अंबेडकर ) स्वयं जातिवाद के कट्टर विरोधी थे जो उनकी अध्यक्षता में संविधान सभा द्वारा रचित भारत के संविधान से सुस्पष्ट है, मगर उनके बाद के सांसदों ने संविधान में अब तक 80 संशोधन किये हैं तथा अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा-संस्थाओं में जाति-आधारित आरक्षण और उससे जुड़ी अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समस्याओं के लिए क्या डॉ० अम्बेडकर को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है? नहीं। क्या हम उनके धवल चरित्र और राष्ट्रीय निष्ठा पर जाति-द्वेष और जाति-आधारित सामाजिक विघटन के कलंक को उनके माथे पर थोप सकते हैं? नहीं। यदि आज का जाति-आधारित आरक्षण का स्वरूप आगे चलकर और भी अधिक बीभत्स, विघटनकारी, द्वेषपूर्ण और निष्कृष्ट हो जाये तो क्या उसके लिए डॉ० अम्बेडकर और उनकी संविधान सभा को दोषी ठहराया जायेगा, क्योंकि उन्होंने तो आज की जातिगत राजनीति से प्रेरित व्यवस्था को मान्यता नहीं दी थी ? यह तो राजनैतिक विकृतीकरण है। इसी प्रकार वर्तमान जन्मना जाति-व्यवस्था, मनु की कर्मणा वर्ण-व्यवस्था से विरोधी व्यवस्था है जोकि हिन्दू धर्म की महानतम विकृति है। साथ ही जब डॉ० अम्बेडकर मानते हैं कि “अकेला मनु न तो जाति-व्यवस्था को बना सकता है और न लागू कर सकता था।” (मनु का विरोध क्यों? सुरेन्द्रकुमार, पृ० 20) तो फिर हिन्दू समाज में कालान्तर में हुए इस विकृतीकरण के लिए भला मनु कैसे उत्तरदायी हो सकते हैं ? वे तो वर्ण-व्यवस्था को सख्ती से पालन करने-करवाने के पक्षधर थे, जिसे अम्बेडकर ने भी माना है।”
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
Jd News Vision