Breaking News

मनुस्मृति और भारतीय संविधान ,भाग 10 क…

JD NEWS VISION….

मनुस्मृति और भारतीय संविधान ,भाग 10 क

हमारा शूद्र वर्ग और मौलिक अधिकार

शूद्र को अछूत बनाने की घटनाएं महाभारत काल के बाद की हैं। जब भारत की वैदिक संस्कृति का ज्ञान सूर्य अंधकार में चला गया था। इसके बाद विभिन्न मत मतांतर देश में कुकुरमुत्तों की भांति उपजे। स्वामी दयानंद जी राजा राममोहन राय जैसे कई समाज सुधारकों ने इस वर्ग की दयनीय दशा को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किये। महात्मा गांधी ने भी इस वर्ग के उद्धार के लिए “अस्पृश्यता-विरोधी-मंडल ” नाम की अखिल भारतीय संस्था की स्थापना की। कालांतर में इस संस्था का नाम परिवर्तित कर में ” हरिजनसेवक-संघ ” कर दिया गया था।
इस संगठन के संविधान के निर्माता गांधी जी स्वयं थे। इस संगठन का पहला अध्यक्ष घनश्याम दास बिड़ला जी को बनाया गया था। जिसमें स्पष्ट व्यवस्था की गई थी कि-” संघ का उद्देश्य हिंदू समाज में सत्यमय एवं अहिंसक साधनों द्वारा छुआछूत को मिटाना और उससे पैदा हुई उन दूसरी बुराइयों तथा निर्योग्यताओं को जड़मूल से नष्ट करना है, जो तथाकथित अछूतों को, जिन्हें इसके बाद “हरिजन” कहा जाएगा, जीवन के सभी क्षेत्रों में भोगनी पड़ती हैं और इस प्रकार उन्हें पूर्ण रूप से शेष हिंदुओं के समान स्तर पर ला देना है।”
“अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हरिजन-सेवक-संघ भारत भर के सवर्ण हिंदुओं से संपर्क स्थापित करने का प्रयत्न करेगा और उन्हें समझाएगा कि हिंदूसमाज में प्रचलित छूआछूत हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों और मानवता की उच्चतम भावनाओं के सर्वथा विरुद्ध है, तथा हरिजनों के नैतिक, सामाजिक और भौतिक कल्याणसाधक के लिए संघ उनकी भी सेवा करेगा। ”
गांधी जी ने निश्चित रूप से मनुस्मृति नहीं पढ़ी थी। यही कारण रहा कि उन्होंने अस्पृश्यता की इस सामाजिक बुराई के लिए कभी मनु को उद्धृत नहीं किया। यदि गांधी जी मनुस्मृति को पढ़े होते तो निश्चित रूप से वह हरिजन समाज के लोगों के भीतर मनुस्मृति के प्रति प्रेम उपजाने पर बल देते और उन्हें बताते कि मनु महाराज तो सामाजिक समरसता के समर्थक थे। परंतु कालांतर में कुछ लोगों ने निहित स्वार्थ में उनकी मनुस्मृति में मनचाहे प्रक्षेप कर दिए।

मनुस्मृति को लेकर किया गया दुष्प्रचार

आजकल हमारे हरिजन वर्ग के स्वजातीय भगिनियों और बन्धुओं को यह कहकर भ्रमित किया जा रहा है कि उनके साथ सृष्टि प्रारंभ से ही अत्याचार होते आए हैं और इन अत्याचारों का एकमात्र कारण मनु है। जिसने मनुस्मृति जैसा ग्रंथ लिखकर सीधे-सीधे शूद्रों के साथ अन्याय किया। हिंदू समाज की इस विकृति का उपचार नहीं किया गया। स्वामी दयानंद जी और स्वामी श्रद्धानंद जी की अछूतोद्धार की योजना पर यद्यपि आर्य समाज जैसे पवित्र संगठन ने बहुत अधिक काम किया और उसके सुखद परिणाम भी आए, परंतु इसके उपरांत भी समस्या विकराल बनी रही।
यही कारण रहा कि जब देश का विभाजन हो रहा था तो उस समय भी आज की भांति ही ” जय भीम और जय मीम ” का शोर मचा कर हरिजन वर्ग को भारत के हिंदू समाज से दूर करने का घृणास्पद प्रयास किया गया था । ‘ जय भीम और जय मीम ‘ के उस शोर में कई लोग ऐसे थे जो भ्रमित हो गए थे। यह भी एक संयोग की ही बात थी कि जिस समय देश विभाजन की बातें हो रही थीं और साथ ही साथ हिंदू समाज को तोड़ने का भी कुचक्र रचा जा रहा था, उसी समय हमारे देश के संविधान का निर्माण हो रहा था।

मनुस्मृति और हमारी संविधान सभा

स्पष्ट है कि हमारी संविधान सभा पर परिस्थितियों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। जिसका परिणाम यह हुआ कि संविधान सभा में मनुस्मृति के किसी श्लोक तक पर भी चर्चा नहीं हुई। उस समय यदि महर्षि मनु और उनकी मनुस्मृति पर किसी का बोलने को मन भी किया होगा तो वह भी इसलिए शांत रह गया होगा कि इस समय इस पर विचार करना किसी को पसंद नहीं आएगा। क्योंकि उस समय यही उचित माना जा रहा था कि हिंदू समाज को साथ लाने का प्रयास किया जाए । यदि इस समय मनु और उनकी मनुस्मृति विवादित समझे जा रहे हैं तो देश- काल- परिस्थिति के अनुसार वर्तमान में इस पर मौन रखा जाए, बाद में इस पर चर्चा कर सकते हैं। ऐसे बिंदुओं पर अक्सर ऐसा ही होता है, लोग तात्कालिक आधार पर मौन साध लेते हैं और जब उनको बाद के लिए चर्चा का विषय बनाकर छोड़ दिया जाता है तो इतनी देर में उसका विरोधी पक्ष और अधिक दुष्प्रचार करके उन बिंदुओं को विवादास्पद बना डालता है। कई लोगों को यह कहने का भी अवसर प्राप्त हो जाता है कि यदि अमुक मुद्दा इतना ही महत्वपूर्ण था तो इस पर पूर्व में उपस्थित हुए अवसरों पर चर्चा क्यों नहीं की गई ? यदि उस समय के लोगों ने इस पर चर्चा करना अनुचित माना था तो मानना चाहिए कि इस मुद्दे में अब कोई बल नहीं है। फलस्वरुप उस पर कभी चर्चा नहीं हो पाती। संविधान सभा में मनुस्मृति पर मौन रहना कालांतर में देश के लिए महंगा पड़ा।

किया गया विपरीत प्रयास

मनुस्मृति पर तात्कालिक आधार पर मौन रखे जाने के इस प्रयास में विपरीत प्रयास यह हो गया कि हमने समाज को यह संदेश दे दिया कि मनु वास्तव में कहीं न कहीं जाति व्यवस्था के लिए उत्तरदायी रहे हैं और उनकी मनुस्मृति आज के समय में प्रासंगिक नहीं है । इस प्रयास को करते-करते लोगों ने पश्चिमी दृष्टिकोण को अपनाकर आरक्षण की बीमारी को स्वीकार कर लिया। इस आरक्षण ने कालांतर में जातीय स्वरूप धारण कर लिया। जिससे आरक्षण को लेकर जातीय कलह देश में बढ़ने लगा। इसीलिए हमारे संविधान में समता मूलक समाज की संरचना करने के लिए समता व समानता जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।
हमारे सभी हरिजन भाइयों अर्थात अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों को संविधान के माध्यम से यह आभास कराया जाना अपेक्षित था कि वैदिक सत्य सनातन धर्म में कभी भी कोई भी वर्ग हरिजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अछूत नहीं माना गया है। वहां पर मौलिक समानता की बात की गई है। अतः भारतवर्ष अपने ऋषियों की इस परंपरा का अनुकरण करते हुए सर्व समाज की समानता का संकल्प लेता है और अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाता है कि भविष्य में प्रत्येक वर्ग समानता के आधार पर न्याय, अवसर और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।

आरक्षण की राजनीति और जातिवादी व्यवस्था

हमारे संविधान में जहां पर आरक्षण के माध्यम से लोगों को समानता का स्थान दिलाने का प्रयास किया गया है, वहां पर आरक्षण की व्यवस्था तो कर दी गई परंतु यह व्यवस्था पूरे संविधान में कहीं पर भी नहीं की गई कि जो व्यक्ति एक बार आरक्षण का लाभ प्राप्त कर अपना मानसिक, आत्मिक और बौद्धिक विकास करने में और सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय प्राप्त करने में सफल हो जाएगा
उसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अथवा हरिजन अथवा शूद्र होने से मुक्ति मिल जाएगी और उसे ऊंचे वर्ण में स्वीकार कर लिया जाएगा।
राजनीति में रहने वाले लोगों ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की परंपरागत शूद्र – अवस्था को यथावत बनाए रखने में अपना लाभ देखा। क्योंकि उनको वोटों की राजनीति करनी थी। इसलिए राजनीति करने वाले लोगों ने इस व्यवस्था को किसी ने किसी रूप में बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी कई लोग हैं जो सामाजिक अस्पृश्यता का सामाजिक लाभ लेने में रुचि दिखाते हैं। परंतु सारा समाज जातिविहीन हो जाए, इस दिशा में किसी कार्य योजना पर काम नहीं करते ।

दिया गया अधूरा उपचार

जिन लोगों ने सीधे-सीधे अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लोगों की राजनीति की, उन्होंने तो देश के परिवेश को बिगाड़ा ही, जो लोग दूसरे प्रकार की राजनीति कर रहे थे, उन्होंने भी कोई सकारात्मक सोच अथवा चिंतन शूद्र वर्ग की स्थिति को सुधारने के लिए प्रस्तुत नहीं किया। यदि उनके पास कोई उपाय था तो वह केवल इतना ही था कि किसी सवर्ण की थाली में से कुछ सामान उठाकर शूद्र की थाली में रख दो और उस व्यक्ति को डंडे के बल पर शांत रहने को कहो, जिसकी थाली में से सामान उठाया गया था। बाद में जब उचित अवसर आए तो इस कार्य के बदले शूद्र की वोट प्राप्त कर लो। वास्तव में इस प्रकार की राजनीति अथवा राजनीतिक सोच समस्या का उपचार नहीं था। परंतु दुर्भाग्य से इसी को उपचार मान लिया गया। वास्तव में यह सही उपचार नहीं था, इसे अधूरा और रोग ग्रस्त मानसिकता से उपजा कहा जा सकता है।

मनु महाराज ने दिया था सही दृष्टिकोण

इस उपचार के स्थान पर लोगों को वास्तविक उपचार दिया जाता और बताया जाता कि मनु महाराज ने अपनी मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था की है कि जो व्यक्ति अपना उत्थान कर आगे बढ़ने में सफल हो जाएगा वह वैश्य, क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण वर्ण को प्राप्त कर लेगा अर्थात जिस व्यक्ति की सामाजिक और बौद्धिक स्थिति आज निचले पायदान पर है, वह अपने परिश्रम और पुरुषार्थ से ऊंचे पद और सामाजिक स्थिति को भी प्राप्त कर सकता है। यही वास्तविक समानता है और यही वास्तविक समानता की गारंटी है।
इस गारंटी में किसी भी प्रकार के जातीय कलंक के लगने की कहीं रंचमात्र भी संभावना नहीं है। वर्ण परिवर्तन की पूर्ण संभावना होने के कारण अपने मानसिक,आत्मिक, बौद्धिक विकास की सारी संभावनाएं खुली रहती हैं। इसमें व्यक्ति को पूर्ण मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं। जिनको प्राप्त कर वह अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और यदि किसी का व्यक्तित्व पतन को प्राप्त होता है तो वह फिर अधोगति में जाकर निम्न वर्ण में स्वाभाविक रूप से पहुंच जाता है।
संविधान में दी गई आरक्षण की व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के लिए यह स्थिति उपलब्ध नहीं कराती कि वह व्यक्ति यदि आज किन्हीं कारणों से पिछड़ गया है तो वह परिश्रम और पुरुषार्थ से अपना सामाजिक स्तर ऊंचा उठा सकता है। जितनी देर में वह अपने शुभ कार्यों , परिश्रम और पुरुषार्थ से आगे बढ़ता रहेगा, तब तक वह समाज में उच्च वर्ण को प्राप्त किए रहेगा। परंतु यदि वही व्यक्ति कालांतर में पतन को प्राप्त होता है तो ऐसी स्थिति में वह फिर समाज के निचले पायदान पर आ जाएगा। संवैधानिक आरक्षण की स्थिति को प्राप्त करके भी व्यक्ति अनुसूचित जाति और जनजाति का बना रहता है अथवा उसी जाति का बना रहता है, जिससे वह स्वयं भी हीनता अनुभव करता है। यदि ऐसा है तो यह सामाजिक न्याय नहीं है। इसके साथ ही यदि वह व्यक्ति आरक्षण प्राप्त करके फिर भी किसी अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति का मार्ग रोक कर खड़ा है तो वह न केवल अपने सजातीय अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के साथ अन्याय कर रहा है अपितु वह किसी अगड़ी जाति के व्यक्ति का अधिकार छीन कर सामाजिक अन्याय को बढ़ावा भी दे रहा है। यह अन्याय कैसे रोका जाए ? – इस पर संविधान मौन है और सरकारें बार-बार कोई ना कोई नकारात्मक कानून बनाकर स्थिति को और जटिल बनाती जा रही हैं ? इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए वे लोग तैयार बैठे हैं जो हिंदू सनातन धर्म को कमजोर कर इस देश को जातियों के टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं । क्योंकि इससे उनका अंतिम लक्ष्य अर्थात सनातन का पूर्ण विनाश साधने में सफलता मिल सकती है । शत्रु अपनी चाल बड़ी साधकर चल रहा है और निशाने पर तीर लगाए बैठा है। जबकि हिंदू समाज खतरे से सावधान नहीं है। सरकारों में बैठे लोग सब कुछ समझकर भी अनसमझ होने का नाटक कर रहे हैं।

नोट: यह लेख मेरी पुस्तक “मनुस्मृति और भारतीय संविधान” से लिया गया है। यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा अभी हाल ही में प्रकाशित की गई है, जिसका मूल्य ₹250 है ।

(डॉ राकेश कुमार आर्य)

About admin

Check Also

वाल्मीकि समाज ने बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई गई…

जेडी न्यूज़ विज़न…. 14 अप्रैल 2026 को पुरानी बाजार तुलसीपुर डिवहार बाबा स्थान बाल्मीकि बस्ती …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *