जेडी न्यूज विजन….
मनुस्मृति और भारतीय संविधान ,भाग 10 ख….
हमारा शूद्र वर्ग और मौलिक अधिकार….
आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्राविधान….
अनुच्छेद 15(3) संविधान का यह अनुच्छेद राज्य को
महिलाओं और बच्चों के लिये कुछ विशिष्ट प्रावधान करने के लिए शक्ति प्रदान करता है।
अनुच्छेद 15(4) यह संवैधानिक अनुच्छेद सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए राज्य को कुछ विशेष प्रावधान स्थापित करने के लिए अधिकृत करता।है।
अनुच्छेद 15(5) ऐसे पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों की उन्नति के लिए, जो शैक्षणिक रूप में पिछड़ गए हैं, यह अनुच्छेद राज्य को विशेष प्रावधान करने की अनुमति प्रदान करता है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्य प्रावधान कर सकता है कि ऐसे लोगों की उन्नति के लिए निजी संस्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में उनका प्रवेश कराया जा सके।
अनुच्छेद 15(6)(ए) राज्य को खंड (4) और (5) आर्थिक रूप से दुर्बल वर्ग की उन्नति के लिए यह अनुच्छेद राज्य को विशेष प्रावधान करने के लिए अधिकृत करता है।
अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में सकारात्मक भेदभाव या आरक्षण का आधार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 16(4) में प्रावधान है कि राज्य नागरिकों के किसी भी ऐसे पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिये कोई भी प्रावधान कर सकता है, जिनका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
अनुच्छेद 16(4 a) में व्यवस्था प्रदान की गई है कि राज्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिये कोई भी प्रावधान कर सकता है (यदि उन्हें राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।)
अनुच्छेद 16(6) में प्रावधान है कि राज्य किसी भी आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिये कोई उपबंध कर सकता है।
इन संवैधानिक अनुच्छेदों का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि राज्य अगड़ा- पिछड़ा, कमजोर, अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति आदि के रूप में तो देश के नागरिकों को देखता है परंतु यह स्पष्ट नहीं करता कि जिन्हें वह पिछड़े वर्ग के रूप में या कमजोर वर्ग अथवा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में देख रहा है उन्हें बौद्धिक स्तर पर ऊंचा कैसे उठाया जाए ?
किसी को नौकरी में आरक्षण देने से उसकी आर्थिक स्थिति में परिवर्तन आ सकता है, परंतु हमारा मानना है कि आर्थिक स्थिति को सुधार देना ही सब कुछ नहीं होता। इसके अतिरिक्त एक सामाजिक स्थिति भी होती है। जिसमें व्यक्ति को सम्मान मिलना भी आवश्यक होता है , राज्य इन प्रावधानों में यह स्पष्ट नहीं करता कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को सुधारकर उसकी सामाजिक स्थिति को सम्मान पूर्ण कैसे बनाया जाए ? यह भी स्पष्ट नहीं किया जा सका है कि ऐसे व्यक्तियों का बौद्धिक स्तर कैसे ऊंचा उठाया जाए जो अपने आप को किसी हीन भावना से ग्रस्त पाते हैं और जो लोग किसी को हीन दृष्टि से देखते हैं उनके दृष्टिकोण को शुद्ध कैसे किया जाए ?
शिक्षा में समानता आवश्यक
ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक कि शिक्षा में समानता नहीं होगी। जब तक आईएएस का बेटा आईएएस बनने के लिए महंगी शिक्षा प्राप्त करेगा और निर्धन का बेटा निर्धन बनने के लिए नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा। शिक्षा में समानता की बात संवैधानिक प्रावधानों में तो कर दी गई, परंतु आईएएस अथवा किसी धनिक वर्ग के व्यक्ति के बेटे को निर्धन के साथ कैसे शिक्षा दी जा सकेगी अथवा उन दोनों को एक साथ कैसे बैठाया जा सकेगा, इस पर कोई व्यवस्था नहीं दी गई है।
मनु अपने संविधान में अर्थात मनुस्मृति में कहीं पर भी ऐसा प्रावधान नहीं करते कि ब्राह्मण का बालक अलग शिक्षा प्राप्त करेगा और शूद्र का बालक अलग शिक्षा प्राप्त करेगा। मनु के अनुसार शिक्षा संस्कार सबको बराबर मिलेंगे। अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार अपना वर्ण सुनिश्चित करेंगे। जन्म के आधार पर मनु किसी की जाति सुनिश्चित नहीं करते
यहां तक कि किसी का वर्ण भी जन्म के आधार पर सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। योग्यता के आधार पर ही वर्ण प्राप्त होता है। नया वर्ण प्राप्त करते ही कुल , वंश के आधार पर मिला वर्ण समाप्त हो जाता है। योग्यता के आधार पर नया वर्ण मिल जाता है अथवा अयोग्यता के आधार पर वर्ण में गिरावट भी आ सकती है। ऐसी ही स्थिति संविधान के माध्यम से स्पष्ट होनी चाहिए थी।
संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था
मनु की व्यवस्था के अनुसार संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत मानव अधिकारों की घोषणा (1948 ) के अनुच्छेद 01 में स्पष्ट किया गया है कि ” सभी मनुष्य जन्म से ही गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से स्वतंत्र और समान हैं।उन्हें बुद्धि और अन्तश्चेतना प्रदान की गई है। उन्हें परस्पर भ्रातृत्व की भावना से कार्य करना चाहिए।”
सभी के अधिकार समान
सांप्रदायिक आधार पर तुष्टिकरण की नीतियों को प्रोत्साहित करने वाले संवैधानिक अनुच्छेदों और आरक्षण के माध्यम से वोटों की राजनीति को प्रोत्साहित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को तुरंत संविधान से निकाल बाहर करना चाहिए। हमारी स्पष्ट मान्यता है कि स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाली हर कार्यवाही मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप है। आप किसी के मौलिक अधिकारों को अत्यंत सीमित और किसी के अधिकार को असीमित विस्तार नहीं दे सकते। मौलिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान हैं। किसी का व्यक्तिगत मजहब किसी को कोई विशेष सुविधा प्राप्त नहीं करा सकता और किसी की विशेष सामाजिक स्थिति भी उसे विशेष मौलिक अधिकार प्रदान करने में सहायक नहीं हो सकती।
भारत एक सनातन राष्ट्र है सनातन धर्म को मानने वाला राष्ट्र है इसलिए सनातन धर्म के सिद्धांत , शिक्षा और उसकी मान्यताएं हम सबके लिए अनुरक्षण और परिरक्षण करने के योग्य हैं। जिसके बिना हमारा अस्तित्व असंभव है, उसको प्राप्त करना अथवा उसकी रक्षा किये रखना ही हमारा मौलिक अधिकार होता है। इसलिए सनातन को उसके सत्य मौलिक स्वरूप में बनाए रखना और उसके वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ कोई किसी प्रकार का खिलवाड़ न करना भारत के लोगों का प्रथम मौलिक अधिकार घोषित होना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि भारत के युवाओं के चरित्र निर्माण के लिए सनातन के सिद्धांतों को और संस्कारों को देश के प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में प्रदान करना भी आवश्यक होगा।
नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करना भारत के नागरिकों का मौलिक अधिकार होगा। ऐसे प्रावधान के साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि शिक्षा सबकी समान होगी और किसी को भी विशेष शैक्षणिक संस्थानों में जाकर विशेष शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा। हमारा मानना है कि समस्या के मूल पर प्रहार होना चाहिए। जब समस्या का मूल ही छिन्नभिन्न हो जाएगा तो समस्या का पूर्ण निदान हो जाएगा।
आज के शूद्र भी नहीं जानते कि…
आज का शूद्र कब ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य रहा था ? इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता अर्थात आज का शूद्र परंपरागत रूप से शूद्र नहीं है। हो सकता है कि उसके पिता पिता के पिता परंपरागत रूप से शूद्र चले आ रहे हों, परंतु कुछ पीढ़ियां पीछे जाकर यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि वह किसी पीढ़ी में ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य में से कोई एक था। यदि इस प्रकार के कार्य पर शोध किया जाए तो पता चलेगा कि देश के सनातन धर्मी सभी लोग ( इतना ही नहीं, भारतीय सनातनी होकर जिन लोगों ने इस्लाम अथवा ईसाइयत को स्वीकार किया , वह भी ) मूल रूप में सनातनी ही रहे हैं और ये सनातनी ही भारत के मूल निवासी हैं। जबकि आज नया विमर्श तैयार किया जा रहा है कि आज की अगड़ी जातियों के लोग विदेशी हैं और शूद्र लोग इस देश के मूल निवासी हैं। सनातन धर्म के मानने वाले हिंदुओं को अपने अतीत को पहचानना और समझना चाहिए। हमने इस बात का प्रयास करना चाहिए कि हम सभी सामाजिक समरसता में विश्वास रखते हैं।
जिस जाति अथवा देश को अपना इतिहास बोध नहीं रहता है, जिसके भीतर से उसके इतिहासबोध को मिटा दिया जाता है , वह जाति मिटने के कगार पर होती है। भारत के हम सनातन धर्म को मानने वाले लोगों को हमारे गौरवपूर्ण अतीत से काटकर जिस प्रकार के झूठे विमर्श तैयार किए गए हैं, उससे हमारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता के साथ-साथ सामाजिक समरसता की भावना को भी कुठाराघात लगा है।
समय रहते हमें अपने सांस्कृतिक गौरवबोध से भरे अतीत के गौरवशाली इतिहास को पढ़ने के अपने मौलिक अधिकार के लिए भी काम करना होगा। हमारे संविधान में यह स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए कि गौरवबोध कराने वाले इतिहास को पढ़ना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा। किसी भी नागरिक को भारत के इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष से वंचित करना दंडनीय अपराध होगा। जो लोग इस प्रकार के अपराध को कर रहे हैं, उन्हें राष्ट्र का शत्रु माना जाएगा- यह प्रावधान भी संविधान होना चाहिए।
मिले पराक्रम प्रदर्शन का मौलिक अधिकार
देश के प्रबुद्ध, सजग नागरिकों को अपने राष्ट्र धर्म का निर्वाह करने के लिए आगे आना होगा। भारत की बौद्धिक विरासत पर सबका समान अधिकार हो और उसे अपना कर राष्ट्र निर्माण में सभी सहयोगी और सहभागी बने इसके लिए कार्य किया जाना समय की आवश्यकता है। सरकारों को अपनी उस बौद्धिक – सांस्कृतिक विरासत पर काम करने वाले युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए जो न्यायपरक वैदिक सिद्धांतों के लिए काम कर रहे हैं। राम की संस्कृति को स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं। कृष्ण जी की संस्कृति को स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं। हम अपनी सांझा विरासत को लुटने नहीं देंगे और लूटने वालों को मिटा कर रहेंगे – यह भी हमारा एक मौलिक अधिकार है। जिसे पराक्रम प्रदर्शन का मौलिक अधिकार कहा जाना चाहिए। पता नहीं, सरकारें इस प्रकार के मौलिक अधिकार को देने से क्यों पीछे हटती हैं ?
ऐसा नहीं है कि केवल सरकारों को दोष दे दिया जाए। सनातन को मानने वाले लोग भी दोषी हैं जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने के प्रति सजग नहीं हैं। होना यह चाहिए कि सनातन को मानने वाले लोगों की ओर से भी आवाज उठानी चाहिए कि हम पराक्रम प्रदर्शन का मौलिक अधिकार चाहते हैं। जिससे कि हमारी सांस्कृतिक विरासत की परंपरा को अक्षुण्ण और सजीव रखा जा सके।
नोट: यह लेख मेरी पुस्तक “मनुस्मृति और भारतीय संविधान” से लिया गया है। यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा अभी हाल ही में प्रकाशित की गई है, जिसका मूल्य ₹250 है ।
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
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