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आजादी की शाम नहीं होने देंगे

जेडी न्यूज विजन …..

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ। उसके बाद हमारे देश ने संसदीय शासन प्रणाली को अपने लिए उपयुक्त माना। यह हम सबके लिए गर्व की बात है कि इंदिरा गांधी के द्वारा लगाए गए आपातकाल के कुछ सीमित से कालखंड को यदि छोड़ दिया जाए तो भारत में शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। हमारे देश में चाहे कितनी ही राजनीतिक उठापटक रही अथवा चाहे कितनी ही राजनीतिक अस्थिरता रही हो, हमने लोकतंत्र का पल्लू पकड़े रखा। कभी हमारी सेना बैरकों से बाहर निकलकर सत्ता पर काबिज नहीं हुई। सेना सदा अपनी मर्यादा में रही और उसने मर्यादा स्थापित करते हुए देश की सेवा करने का अपना सैन्यधर्म निरंतर जारी रखा। यह तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब पाकिस्तान सहित विश्व के कई देशों में 1947 से बाद के अब तक के कालखंड में वहां की सेना ने एक बार नहीं कई कई बार सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। यदि भारत में ऐसा नहीं हुआ है तो इसका केवल एक ही कारण है कि हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हमारे पारिवारिक और राष्ट्रीय संस्कारों में मर्यादा और अनुशासन छिपा हुआ है। भारत में आपातकाल को छोड़कर सामान्य रूप से राजनीतिक स्थिरता बनी रही है। जबकि सांप्रदायिक आधार पर भारत को तोड़कर बनाए गए पाकिस्तान में हमें राजनीतिक अस्थिरता ही दिखाई देती है। जहां हमने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक ढंग से सरकारों की अदला-बदली को प्राथमिकता दी है, वहीं पाकिस्तान ने मुगलकाल और तुर्क काल के मुस्लिम इतिहास को दोहराते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह आज भी खूनी राजनीति में ही विश्वास करता है। यहां भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ( पाकिस्तान के सैनिक शासकों की भी ) के नामों की सूची आपके अवलोकन हेतु प्रस्तुत की जा रही है। जिसे देखकर आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि भारत जहां अपने परंपरागत संस्कारों के कारण शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ता रहा है, वहां पाकिस्तान की राजनीति अपनी परंपरागत मुगलिया रक्तभरी संस्कृति से प्रभावित रही है । यह आदर्श का अंतर है। पाकिस्तान ने संप्रदाय को अपने जन्म का कारण बनाया और सांप्रदायिक नेताओं की सांप्रदायिक सोच को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया। जिसका परिणाम यह निकला कि वह स्वयं ही सांप्रदायिकता का शिकार होकर उसी की आग में जलता रहा है। चित्ति, उक्ति और कृति की समरूपता मनुष्य को आंतरिक जगत और बाह्य जगत में शांति के साथ समन्वित करती है। इसी को मनसा वाचा कर्मणा की समरूपता कहा जाता है और यह भारत के सांस्कृतिक आध्यात्मिक राष्ट्रवाद में स्वाभाविक रूप से समन्वित है। इसी को आप वैदिक हिंदू संस्कार कह सकते हैं।

अब तक के भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची

*जवाहरलाल नेहरू (15 अगस्त 1947– 27 मई 1964)
*गुलजारीलाल नंदा (कार्यवाहक: 27 मई से 9 जून 1964, 11 जनवरी से 24 जनवरी 1966)*लाल बहादुर शास्त्री (9 जून 1964– 11 जनवरी 1966),*इंदिरा गांधी (1966–1977, 1980–1984) *मोरारजी देसाई (1977–1979),*चौधरी चरण सिंह (1979–1980)
*राजीव गांधी (1984–1989)*विश्वनाथ प्रताप सिंह (1989–1990)*चंद्रशेखर (1990–1991)
*पी.वी. नरसिम्हा राव (1991–1996)*अटल बिहारी वाजपेयी (1996, 1998–2004)*एच.डी. देवेगौड़ा (1996–1997)*इंदर कुमार गुजराल (1997–1998)
*डॉ. मनमोहन सिंह (2004–2014)*नरेन्द्र मोदी ( 26 मई 2014 से – आज तक )
गुलजारीलाल नंदा हमारे देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे हैं। उनको छोड़कर नियमित रूप से चुने गए प्रधानमंत्रियों की कुल संख्या 15 है अर्थात भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी भारत के 15 वे प्रधानमंत्री हैं। इस प्रकार हमारे देश में औसतन एक प्रधानमंत्री ने 5 वर्ष से अधिक समय तक शासन किया है। जबकि पाकिस्तान की स्थिति यह है कि वहां पर एक भी प्रधानमंत्री अभी तक ऐसा नहीं हुआ जिसने अपने कार्यकाल के 5 वर्ष पूर्ण किए हों। अब आप देखिए,

पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की सूची

*लियाकत अली (1947- 1951 )*ख्वाजा नजीमुद्दीन (1951-1953)*मोहम्मद अली बोगरा (1953-1955)
*चौधरी मोहम्मद अली (1955-1956)*हुसेन शहीद सुहरावर्दी (1956-1957)*इब्राहिम इस्माइल चुंदरीगर (1957)*मलिक फिरोज खान नून (1957-1958)
*जुल्फिकार अली भुट्टो (1973-1977)*मोहम्मद खान जुनेजो (1985-1988)*बेनजीर भुट्टो (1988-1990, 1993-1996)*गुलाम मुस्तफा जटोई (कार्यवाहक)
*नवाज शरीफ (1990-1993, 1993, 1997-1999, 2013-2017)*मीर जफरुल्ला खान जमाली (2002-2004)*चौधरी शुजात हुसैन (2004)*शौकत अजीज (2004-2007)*यूसुफ रजा गिलानी (2008-2012)*राजा परवेज अशरफ (2012-2013)
*शाहिद खाकान अब्बासी (2017-2018)*इमरान खान (2018-2022)*शहबाज शरीफ (11 अप्रैल 2022 – 14 अगस्त 2023; 3 मार्च 2024 – वर्तमान) ।
पाकिस्तान में कार्यवाहक प्रधानमंत्रियों के रूप में मोइन कुरैशी, मलिक मेराज खालिद, अनवारुल हक काकर आदि का नाम सम्मिलित रहा है। पाकिस्तान में रक्त और राजनीति का चोली दामन का साथ रहा है। वहाँ जैसे ही अवसर हाथ आया वैसे ही वहां के सैन्य अधिकारियों ने सत्ता पर कब्जा करने में देर नहीं की। पाकिस्तान को बने हुए अभी कठिनाई से एक दशक ही बीता था कि वहां की सेना के सेनापति इस्कंदर मिर्ज़ा ने ( 1958) पाकिस्तान में राजनीति और सेना के परस्पर संबंध को स्पष्ट करते हुए यह स्थापित कर दिया कि वहां की राजनीति मुगलिया संस्कारों के आधार पर चलेगी। उसने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट किया और थोड़ी देर के लिए शासन करने में सफलता प्राप्त की।
अयूब खान पाकिस्तान के पहले सैनिक तानाशाह थे,जिन्होंने देर तक अर्थात 1958 से 1969 तक जबरदस्ती देश पाकिस्तान पर शासन किया। इसी सैनिक तानाशाह के शासनकाल में भारत पाकिस्तान का 1965 का युद्ध हुआ था। अयूब खान को हटाकर याह्या खान ने 1969 से 1971 तक पाकिस्तान पर शासन किया। इसी सैनिक शासक के शासनकाल में भारत पाकिस्तान का युद्ध हुआ था और पाकिस्तान को अपने ही भूभाग अर्थात पूर्वी पाकिस्तान ( वर्तमान बांग्लादेश ) से हाथ धोना पड़ा था। उसके पश्चात देश ने थोड़ी देर लोकतांत्रिक परिवेश में सांस ली, परंतु शीघ्र ही जिया-उल-हक नाम के सैनिक तानाशाह ने उसका गला घोंट दिया। इस सैनिक तानाशाह ने पाकिस्तान पर 1977 से 1988 तक बलात शासन किया। इसके बाद फिर यही हुआ। पाकिस्तान लोकतंत्र की पगडंडी पर थोड़ा सा ही आगे बढ़ा था कि फिर एक सैनिक तानाशाह की राजनीति प्रेरित विकृत मानसिकता ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया। इस बार इस सैनिक तानाशाह का नाम परवेज़ मुशर्रफ था।
परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में ही कारगिल का युद्ध हुआ था यही वह सैनिक तानाशाह था जिसने अटल जी की पीठ में छुरा घोंप दिया था अर्थात जब अटल जी लाहौर बस यात्रा के माध्यम से भारत-पाकिस्तान के संबंधों का नया अध्याय लिखने के लिए पाकिस्तान पहुंचे, तब उस कृतघ्न सैनिक शासक ने कारगिल स्क्रिप्ट पर काम करना आरंभ कर दिया।
इन सैनिक तानाशाहों के शासनकाल में यदि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री का अस्तित्व रहा तो वह केवल नाम मात्र का ही था। वास्तविक सत्ता राष्ट्रपति अर्थात सैनिक तानाशाह में ही निहित रही है । वर्तमान में भी पाकिस्तान में यही हो रहा है। वहां के सेनापति आसिम मुनीर सत्ता पर अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण स्थापित किए हुए हैं और वहां का लोकतंत्र तथा लोकतांत्रिक मशीनरी पूर्णतया सेना के संकेत पर काम कर रही है।
हमें अपने देश के उन राजनीतिज्ञों की सोच से सावधान रहना चाहिए जो देश में गजवा ए हिंद की सोच को प्रोत्साहित करते हैं या सत्ता स्वार्थ सिद्ध करने के लिए गजवा ए हिंद में विश्वास रखने वाले लोगों का सहारा लेते हैं। ऐसी सोच को भारत को नारकीय यातनाओं में धकेलने की तैयारी माना जाना चाहिए। अभी तक कम्युनिस्ट और उसके बाद ममता बनर्जी के शासनकाल में बंगाल में जो कुछ होता रहा है, वह हम सबको सावधान करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। वहां की निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विदेशी घुसपैठियों को भारत का स्थाई नागरिक बनाने पर इसलिए तैयार हो गईं कि ऐसा करने से वह देर तक सत्ता में रह सकेंगी। उन्होंने तनिक भी यह विचार नहीं किया कि विदेशी दुर्गंधयुक्त वायु जब घुसपैठियों के रूप में भारत में प्रवेश करेगी तो वह ‘महामारी’ को साथ लेकर आएगी। जो शासक देश में फैलने वाली संभावित महामारी से परिचित न हो या परिचित होकर भी उसकी ओर से आंख मूँदने का काम करने का अभ्यासी हो, उसे राष्ट्रद्रोही मानकर उसके विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। वैसे तो यह बात 1947 में ही स्पष्ट होनी चाहिए थी कि हम अपने देश की राजनीति को मुगलिया संस्कारों पर कभी चलने नहीं देंगे। परंतु अभी भी समय है कि हम सावधान हो जाएं और सांप्रदायिक आधार पर निर्मित हुए पाकिस्तान की नियति को देखकर यह सोचें कि भारत में उन शक्तियों को कभी फलीभूत नहीं होने दिया जाएगा जो गजवा ए हिंद के माध्यम से राजनीति का मुगलिया संस्करण निकालने के लिए आतुर दिखाई देती हैं। बात केवल एक ही है कि :-

प्रण करते हैं आज़ादी की शाम नहीं होने देंग़े ,
वीरों की समाधियों को बदनाम नहीं होने देंगे ,
जब तक तन में गरम लहू की एक बूँद भी बाकी है,
भारत माता का आँचल नीलाम नहीं होने देंगे।

(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक स्वर प्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )

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