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मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 15 क मनुस्मृति और मौलिक कर्तव्य

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मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 15 क

मनुस्मृति और मौलिक कर्तव्य

हमारे संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 51 में इन मौलिक कर्तव्यों को स्थान दिया गया है । संक्षेप में इनका वर्णन इस प्रकार है :-
( 1) देश के सभी नागरिकों के लिए भारत का संविधान सभा पर होगा, उनके द्वारा भारत के संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों और संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का सम्मान करना।
( 2) भारतीय राष्ट्र के उन महान आदर्शों को संजोना और उनका पालन करना जिन्होंने हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया।
इसका अभिप्राय है कि ” वंदेमातरम ” जैसे गीत और नारे को भी देश का प्रत्येक नागरिक सम्मान से देखेगा। उसके प्रति श्रद्धा रखना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा।
( 3) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना।
अर्थात भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विपरीत कार्य करने वाले लोग देश के शत्रु माने जाएंगे। देश में आतंकवाद फैलाना ,आंतरिक शांति को भंग करना या विदेशी शक्ति के संकेत पर भारत में अराजकता फैलाना राष्ट्र के लिए चुनौती के समान माना जाएगा।
( 4) बुलाए जाने पर देश की रक्षा करना और राष्ट्रीय सेवा प्रदान करना।
अर्थात किसी भी नागरिक को जब देश की एकता और अखंडता के लिए कड़ी चुनौती से निपटने के लिए बुलाया जाएगा तो वह अपनी सेवाएं देकर स्वयं को धन्य समझेगा।
( 5) धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या सांप्रदायिक विविधताओं से परे भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करना।
अर्थात सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों ,अंधविश्वासों और पाखंडों को छोड़कर सामाजिक सद्भाव को प्रोत्साहित करना देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा। महिलाओं का सम्मान करने के लिए प्रत्येक नागरिक अपने आप को सहर्ष समर्पित करेगा।
( 6) हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्ध विरासत का सम्मान करना और उसे संरक्षित करना।
यहां पर ‘ मिश्रित ‘ शब्द उपयुक्त नहीं है। भारत की संस्कृति न तो मिश्रित है और न सांझी है। यह वैदिक संस्कृति के नाम से जानी जाती है। जिससे विश्ववारा संस्कृति भी कहा जाता है। इस संस्कृति की समृद्ध विरासत का सम्मान करना और उसे संरक्षित करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा।
( 7) वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखना।
भारत की संस्कृति यज्ञ की संस्कृति है। यज्ञ की संस्कृति के माध्यम से ही पर्यावरण संतुलन बनाकर रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त झीलों ,नदियों और वन्य जीवन का भी संरक्षण किया जा सकता है। इसलिए यहां पर स्पष्ट किया जाना चाहिए था कि भारत अपनी यज्ञ की संस्कृति का निरंतर पालन करता रहेगा और इसके देश नागरिक यज्ञ की वैदिक संस्कृति को अपना कर चलेंगे।
( 8) वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और जिज्ञासा एवं सुधार की भावना विकसित करना।
अर्थात वैज्ञानिक युग में वेद की वैज्ञानिक सोच को अपनाना, पाखंड अंधविश्वास और वेद विरुद्ध तथा सृष्टि नियमों के विरुद्ध बातों को छोड़ना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा।
( 9) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना।
( 10 ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करना ताकि राष्ट्र निरंतर प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तरों तक पहुंचे।

वैज्ञानिक सोच ही हमें आगे बढ़ाती है

ये दस के दस मौलिक कर्तव्य नितांत आवश्यक हैं। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता एकता और अखण्डता के साथ-साथ देश के संविधान के प्रति ,देश के नागरिकों के प्रति और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति हमें संवेदनशील रहना ही चाहिए। साथ ही वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और जिज्ञासा व सुधार की भावना लेकर आगे बढ़ना चाहिए। रूढ़िवादी सोच हमें रूढ़ियों में जकड़ कर समाप्त कर देती है। इसलिए इस प्रकार की सोच से बचना चाहिए।

स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे सन्तोऽपि मानवा:।
प्रिया भवन्ति लोकस्य स्वे स्वे कर्मण्यवस्थिताः।।

मनु महाराज ‘ मनुस्मृति ‘ के अष्टम अध्याय के ( विशुद्ध मनुस्मृति के अनुसार 32 वें ) श्लोक में कहते हैं कि सौंपे गए अपने-अपने कर्तव्यों को करने वाले और अपने-अपने वर्ण और आश्रमों के कर्तव्यों – कर्मों में स्थित रहने वाले मनुष्य दूर रहते हुए भी समाज में प्रिय अर्थात लोकप्रिय होते हैं।
मनुस्मृति के द्वारा हमें जिस प्रकार अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने के लिए निर्देश दिया गया है, वह कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण प्रकट करता है। मनु की यह व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति पर समान रूप से लागू होती है। यह व्यवस्था बड़े पद पर बैठने वाले व्यक्ति पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी छोटे व्यक्ति पर लागू होती है।
यदि राजा को राष्ट्र रक्षा सहित उसके स्तर के कार्य उसके कर्तव्य कर्म के रूप में दिए गए हैं तो घुड़साल में घोड़ों की सेवा करने वाले व्यक्ति का कर्तव्य कर्म भी राजा की बराबर ही महत्वपूर्ण है। दोनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने-अपने स्तर पर कर्तव्य के प्रति निष्ठा दिखाते हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन करें।
यही बात राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होती है।

चारों आश्रमों के कर्तव्य कर्म

महर्षि मनु ने चारों आश्रमों में रहने वाले लोगों के लिए उनके कर्तव्य कर्मों को उनके धर्म के रूप में स्पष्ट किया है। ब्रह्मचारियों के कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए महर्षि मनु ने बताया है कि प्रत्येक ब्रह्मचारी को उसका गुरु सर्वप्रथम संध्या अग्निहोत्र करना सिखाए। गुरु ब्रह्मचारी को सदैव आलस्यरहित रहने के लिए टोकता रहे और कहता रहे कि ‘ हे शिष्य पढ़ो ‘ और ‘ अब विराम करो ‘ ऐसा भी निर्देश देता रहे। पढ़ने के प्रारंभ में सदैव ‘ ओ३म’ का उच्चारण करे।
अध्ययन काल में मन की साधना के प्रति ब्रह्मचारी को सावधान करते हुए मनु कहते हैं कि उसे इसी काल में अपने मन को बुरे विषयों से दूर हटाने के लिए विषयों में विचरती हुई इंद्रियों के निग्रह हेतु प्रयत्न करते रहना चाहिए। जब इंद्रिय संयम में ब्रह्मचारी स्थिर हो जाता है तो इससे प्रत्येक कार्य में सिद्धि मिलनी आरंभ हो जाती है। जीवात्मा इंद्रियों के विषयों में आसक्त होकर इंद्रिय दोष से ग्रस्त हो जाता है। जब ब्रह्मचारी इन दस इंद्रियों को वश में कर लेता है तो उससे वह सफलता और कल्याण को प्राप्त कर लेता है।
स्वामी दयानंद जी सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 10 में कहते हैं कि ” इंद्रियों को विषय – आसक्ति और धर्म में चलाने से मनुष्य निश्चित दोष को प्राप्त होता है और जब इनको जीतकर धर्म में चलाता है तभी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त होता है।”

मनुष्य जितेंद्रिय बने

मनु कहते हैं कि विषयों का जितना अधिक सेवन किया जाएगा, उतनी ही इच्छाओं की वृद्धि होती चली जाएगी। इसलिए विषयों का त्याग करना ही श्रेष्ठ है। विषयों में फंसे हुए व्यक्ति को कभी अभीष्ट की सिद्धि नहीं होती अर्थात उसे सफलता नहीं मिलती। इसलिए आत्मोन्नति के लिए मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह जितेंद्रिय बने। स्वामी दयानंद जी महाराज मनु महाराज की इन व्यवस्थाओं पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि जो अजितेंद्रिय पुरुष है ,उसको विप्रदुष्ट कहते हैं। उसके करने से न वेदज्ञान, न त्याग न यज्ञ न नियम और न धर्माचरण सिद्धि को प्राप्त होते हैं। किंतु यह सब जितेंद्रिय धार्मिक जन को सिद्ध होते हैं।

वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥

दूसरे अध्याय के इस श्लोक में महर्षि मनु कह रहे हैं कि संसार में रहते हुए प्रत्येक मनुष्य मात्र के लिए धन, बंधु बांधव ,आयु, उत्तम कर्म और पांचवी श्रेष्ठ विद्या- यह पांच सम्मान देने के स्थान हैं । परंतु इनमें जो बाद वाला है वह अतिशयता से उत्तम अर्थात बड़ा है। धनी से अधिक बंधु- बांधव, बंधु- बांधव से अधिक बड़ी आयु वाले, बड़ी आयु वाले से अधिक श्रेष्ठ कर्म करने वाले और श्रेष्ठ कर्म वालों से उत्तम विद्वान उत्तरोत्तर अधिक माननीय हैं।”
इस प्रकार समाज में हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम इसी प्रकार से लोगों का सम्मान करें। इस प्रकार के सम्मान प्रदान करने के भाव से समाज में उत्तम परिवेश सृजित होता है। इस उत्तम परिवेश में प्रत्येक मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। सामाजिक शांति मनुष्य की उन्नति में बहुत अधिक सहायक होती है। इसलिए समाज में शांति अवस्था बनाए रखना सरकारों का प्रमुख कार्य होता है। जो सरकार समाज में शांति व्यवस्था बनाने में असफल हो जाती है, वह समाज की अराजकता को मिटाने में भी कभी सफल नहीं हो सकती।
( लेखक की पुस्तक- मनुस्मृति और भारतीय संविधान से )

डॉ राकेश कुमार आर्य

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