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लखनऊ: : उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सूबे की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए अपनी कमर कस ली है।
इसी सिलसिले में बीजेपी ने साल 2022 में जीते अपने मौजूदा विधायकों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ तैयार करना शुरू कर दिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, हाईकमान यह परख रहा है कि क्षेत्र में विधायकों की जमीनी पकड़ कैसी है और जनता के बीच उनकी सक्रियता कितनी है। जिन विधायकों के खिलाफ जनता में नाराजगी देखने को मिल रही है, पार्टी उनका पत्ता साफ करने की पूरी तैयारी में है। बीजेपी अब उनकी जगह नए और जिताऊ चेहरों की तलाश में तेजी से जुट गई है।
दो बाहरी एजेंसियों को मिली जिम्मेदारी, चुपचाप हो रहा काम
बीजेपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि हाईकमान ने इस पूरे सर्वे को बेहद सीक्रेट रखने के लिए इसकी जिम्मेदारी दो बाहरी एजेंसियों को सौंपी है। इन एजेंसियों की टीमें पिछले कई दिनों से यूपी के शहरी और ग्रामीण इलाकों में घूम-घूमकर लोगों से सीधा संवाद कर रही हैं।
इस सर्वे में विधायकों के काम, उनके व्यवहार और क्षेत्र में उनकी मौजूदगी पर जनता से सीधी राय ली जा रही है। इसके साथ ही, इलाके के संभावित नए दावेदारों की लोकप्रियता और उनके जातीय व सामाजिक प्रभाव का भी गहराई से आकलन किया जा रहा है। बीजेपी का साफ मकसद है कि साल 2027 के महादंगल में सिर्फ उसी चेहरे पर दांव लगाया जाए जो जीत की सौ फीसदी गारंटी दे सके।
इस एक मंडल ने बढ़ाई बीजेपी की सबसे बड़ी टेंशन
यूं तो यह सर्वे पूरे उत्तर प्रदेश में मंडलवार तरीके से कराया जा रहा है और ज्यादातर मंडलों में बीजेपी की स्थिति काफी मजबूत नजर आ रही है। लेकिन एक ऐसा मंडल भी है जिसने पार्टी नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। मुरादाबाद मंडल इस समय बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब बना हुआ है।
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2017 के चुनाव में बीजेपी को इस मंडल की 27 सीटों में से 14 पर जीत मिली थी, लेकिन साल 2022 के चुनाव में यह संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गई। पिछले चुनाव में हुए इसी नुकसान की भरपाई करने के लिए पार्टी इस बार मुरादाबाद मंडल में खास सतर्कता बरत रही है और हर एक सीट पर सबसे मजबूत उम्मीदवार की खोज की जा रही है।
संघ की राय और एजेंसियों की रिपोर्ट से तय होगा टिकट
बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, संगठन अपने स्तर पर जिला और क्षेत्रवार संभावित उम्मीदवारों की एक लिस्ट तैयार कर रहा है। इस लिस्ट को फाइनल करते समय स्थानीय सांसदों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की राय को भी पूरा महत्व दिया जाएगा। इसके बाद बाहरी एजेंसियों की खुफिया रिपोर्ट और संगठन द्वारा बनाई गई सूची का आपस में मिलान किया जाएगा।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बड़ा हिंट देते हुए बताया कि जो नाम इन दोनों ही सूचियों में कॉमन होंगे और जिन पर सभी की सहमति बनेगी, उनका टिकट लगभग पक्का माना जाएगा। सूत्रों का कहना है कि एजेंसियां अपनी यह फाइनल रिपोर्ट बेहद जल्द दिल्ली हाईकमान को सौंपने वाली हैं।
योगी सरकार की योजनाओं पर क्या है जनता का मूड?
इस महासर्वे में सिर्फ विधायकों की ही किस्मत का फैसला नहीं हो रहा है, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार की योजनाओं और पिछले नौ साल के कामकाज को लेकर भी जनता का मूड भांपा जा रहा है। पार्टी यह बारीकी से जानना चाहती है कि किस इलाके में सरकार की ब्रांडिंग सबसे मजबूत है और कहां पर ‘एंटी-इनकंबेंसी’ (सरकार के खिलाफ माहौल) का असर दिख रहा है।
नेतृत्व का मानना है कि समय रहते जमीनी हकीकत का पता चलने से साल 2027 की चुनावी रणनीति को और ज्यादा धार दी जा सकेगी। हालांकि, नेतृत्व ने साफ संकेत दे दिए हैं कि जो विधायक अपने काम में फिसड्डी साबित हुए हैं, उनका पत्ता कटना अब तय है।
सपा, बसपा और कांग्रेस भी हुईं अलर्ट
बीजेपी के इस कदम के बाद यूपी के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल भी अब पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गए हैं। कांग्रेस ने पश्चिमी यूपी की सीटों पर प्राइवेट एजेंसियों के जरिए संभावित चेहरों की लिस्ट बनवानी शुरू कर दी है। वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) भी अंदरखाने सर्वे के जरिए अपने मजबूत उम्मीदवार छांटने में लगी है।
दूसरी तरफ, मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तो कई सीटों पर अपने प्रभारियों और संभावित प्रत्याशियों के नामों का ऐलान भी कर चुकी है। इन सब के बीच, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दूसरे दलों के मजबूत और नाराज नेताओं को तोड़कर अपने पाले में लाने की जी-तोड़ कोशिशों में जुटी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो साल 2027 का चुनावी दंगल शुरू होने से पहले ही शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। अब टिकट का गणित, जातीय समीकरण और ये गुप्त सर्वे रिपोर्ट ही तय करेंगे कि अगली बार लखनऊ के सिंहासन पर कौन बैठेगा।
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