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हर कुंवारा ख़राब नहीं होता है
संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार,नई दिल्ली के सहयोग से अनादि सांस्कृतिक,शैक्षिक एवं सामाजिक संस्था द्वारा दो दिवसीय नाट्य समारोह के समापन पर अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संसथान प्रेक्षागृह में शंकर शेष लिखित नाट्यकृति “तिल का ताड़ ” सफल मंचन मुन्नी देवी के निर्देशन में हुआ ।
तिल का ताड़ कुंवरो की आवासीय समस्या पर आधारित नाटक है । नाटक का नायक प्राणनाथ अपने मकान मालिक धन्नामल से झूठ बोलकर उसके यहाँ किराये पर रहता है कि उसकी शादी हुए एक साल हो गया है और उसकी माँ कि तबियत ख़राब है । इसलिए कुछ ही दिन में उसकी पत्नी आ जाएगी । एक साल बीत जाता है,पर उसकी पत्नी नहीं आती है । इसपर धन्नामल प्राणनाथ को चेतावनी देता है कि यदि कल तक तुम्हारी पत्नी नहीं आयी तो परसो मेरा माकन खाली कर देना ।
प्राणनाथ आपने दोस्त पतित पावन शर्मा जो कि समाज सुधारक है उससे अपनी समस्या बतलाता है और एक औरत लाने को कहता है । वो भी उसको आश्वासन देकर चला जाता है । इसी बीच घर के बाहर कुछ गुंडे मंजू देवी को परेशान कर रहे होते हैं । प्राणनाथ मंजू को गुंडों से बचाकर घर ले आता है और अपनी समस्या बतलाता है और अपनी पत्नी बनकर रहने का नाटक करने को राजी कर लेता है और आपने माकन मालिक से मिलवा देता है l
प्राणनाथ का एक और दोस्त जो कि ब्रह्मचारी है वो समझ जाता है कि प्राणनाथ झूठ बोले रहा है इसलिए वो इस झूट का पर्दा फाश करने में लग जाता है । पतित पावन ऑफिस में काम करने वाली बाटलीवाला जो कि शादी के लिए परेशान है उसको ब्रह्मचारी के पीछे लगा देता है । ब्रह्मचारी हर समय बाटलीवाला से परेशान होकर प्राणनाथ से माफ़ी मांगता है ।
इसी बीच प्राणनाथ जिस लड़की से प्यार करता है उसके पिता बनारसीदास और खुद के पिता गयाप्रसाद भी आ जाते हैं । इस तरह एक झूठ छिपाने के चक्कर में प्राणनाथ को बहुत झूठ बोलने पड़ते है जो कि हास्य कि स्थिति पैदा करते हैं । सब बार – बार ये प्रश्न करते हैं कि मंजू कौन है l आखिर झूठ तो झूठ होता है वो सामने आता है और प्राणनाथ का दोस्त अजय आकर बतलाता है कि मंजू मेरी पत्नी है । वह नौकरी के सिलसिले में इस शहर में आयी थी और प्राणनाथ ने उसको शरण दी । दोनों पिताओ की शंका दूर होती है और प्राणनाथ के पिता बनारसीदास की लड़की से से अपने लड़के कि शादी तय कर देते हैं । इस नाटक से ये सन्देश मिलता है कि हर कुंवारा लफंगा नहीं होता । इसलिए समाज के लोगो को ये विचार अपने मन से निकाल देना चाहिए ।
मंच पर संदीप देव,संकल्प शुक्ला,मुकुल चौहान,अनिल कुमार,गुरुदत्त पांडेय,योगेंद्र पाल,दिव्यांश गुप्ता,अंशिका सक्सेना,लावण्या बाजपेई ने परिपक़्व अभिनय किया । मंच परे मुखसज्जा-राजकिशोर गुप्ता, संगीत संयोजन एवं संचालन -आदित्य कुमार शर्मा एवं प्रकाश सञ्चालन-तमाल बोस का नाट्यानुरूप था ।
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