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कविता
क्यों रिसते हुए आँसू,
मरहम नहीं लगते…!
ठेस लगती है ज़ख्म होता है,
जब भी अपना दगा देता है,
जाने क्यों बेवफा सगा होता है
ज़ख्म जब नासूर बनता है,
वो भी ला-इलाज होता है।
अपने फिर भी अपने होते हैं,
नाराज़गी है हरकतों पर उनकी,
फिर भी उनसे दुश्मनी नहीं मन में
तो बस सवाल जवाब यही हरदम,
मन को घायल करता रहता है।
खून अपना है, अपना होता है,
क्यों रिसते हैं आँसू आँखों से,
ये आँखें हैं कोई समंदर तो नहीं,
ये आँसू सूख जायें तो फिर भी,
इनका दिल पे भी असर होता है।।
क्यों रिसते हुए आँसू,
मरहम नहीं लगते…!
दिल जलता है ये जख्म
नासूर बना सा लगता है।।
• मदन वर्मा ”माणिक”
इंदौर , मध्यप्रदेश
दिनांक: 24/03/26
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