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घर-घर रामायण बांटने का आर्य समाज ने उठाया बीड़ा…

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ग्रेटर नोएडा ( विशेष संवाददाता ) : :  आर्य प्रतिनिधि सभा गौतम बुद्ध नगर के तत्वावधान में आज ग्राम पल्ला में रामनवमी पर्व के अवसर पर हवन व विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी महाराज के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला गया। गोष्ठी में बोलते हुए मुख्य वक्ता एडवोकेट देवेंद्र सिंह आर्य ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी भगवान राम के पावन चरित्र से अनभिज्ञ होती जा रही है। श्रीराम के आदर्शों पर चलकर आज भी विश्व गुरु भारत का निर्माण संभव है। श्रीराम आदर्श राजा ही नहीं परम राजनीतिज्ञ और कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे। राम के वन गमन अयोध्या वापसी को लेकर बहुत सी भ्रांतियां समाज में प्रचलित हैं ,उनका उन्मूलन वाल्मीकि रामायण के स्वाध्याय से ही संभव है। श्री आर्य ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में इस बात का प्रमाणिक आधार पर भ्रांति निवारण किया कि रामचंद्र जी महाराज का वन से लौटने का उपक्रम कार्तिक माह में संपन्न हुआ था। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयं रामायण में ही इस प्रकार की साक्षी उपलब्ध हैं जिनके आधार पर यह स्पष्ट किया जा सकता है कि रामचंद्र जी महाराज का वन से लौटने का उपक्रम चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संपन्न हुआ था।
आर्य प्रतिनिधि सभा गौतम बुद्ध नगर के प्रधान डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि वे लोग सबसे बड़े धर्म-संस्कृतिद्रोही रामद्रोही हैं जो राम को आज भी काल्पनिक मानते हैं। रामायण को केवल ऐतिहासिक काव्य मात्र मानते हैं, ऐसे लोगों का पर्दाफाश आर्य समाज सदैव करता रहेगा। श्रीराम के लोक कल्याणकारी सिद्धांत सच्चे अर्थों में एक आदर्श राष्ट्र के निर्माण के लिए नीति निर्देशक सिद्धांत हैं। भारतीय संविधान में इन्हें शामिल किया जाना चाहिए। श्रीराम की व्यवस्था में 1000 मूर्खों के मत का कोई मूल्य नहीं है, एक बुद्धिमान के मत की तुलना में । महत्वपूर्ण पदों पर कुलीन सुपरक्षित परिवारों के व्यक्तियों की नियुक्ति श्रीराम की राजनीतिक व्यवस्था में होती है। ऐसा नहीं है कि कोई भी महत्व परीक्षा पास करके कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर दिया जाए। डॉ आर्य ने कहा कि वन में रामचंद्र जी और भरत का संवाद हमें विशेष रूप से पढ़ना चाहिए। जिसमें रामचंद्र जी महाराज ने भाई भरत को महात्मा का संबोधन देकर राजनीति का भी उपदेश दिया था। राजनीति का वह उपदेश हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के स्थान पर स्थापित होना चाहिए था। परंतु नहीं किया गया, जो कि एक दुर्भाग्य का विषय है। उन्होंने कहा कि आर्य समाज ही वह पवित्र मंच है जो रामचंद्र जी की मानता है, उनके विचारों, आदर्शों और सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करने का सत्संकल्प लेता है। रामचंद्र जी ने अपने भाई भरत को जो भी उपदेश दिया था, वह वेदों के राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर मनु महाराज द्वारा लिखी गई मनुस्मृति के आधार पर दिया गया उपदेश है ,जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना रामचंद्र जी के काल में था।
आर्य भाषा प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष आर्य सागर खारी ने बोलते हुए कहा कि भगवान वाल्मीकि ने रामायण लिखकर वैदिक संस्कृति पर बहुत उपकार किया है। वाल्मीकि रामायण घर-घर वितरित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आर्य समाज का विरोध रामचंद्र जी के शिव संकल्प रूपी पवित्र जीवन से नहीं है बल्कि उन लोगों से है जिन्होंने उनके पवित्र जीवन को कलंकित कर प्रचारित प्रसारित करने का प्रयास किया। आज राम की नीतियों को राष्ट्रनीति के रूप में स्थापित कर राजनीति का पवित्रीकरण करना समय की आवश्यकता है। आदर्श परिवार, आदर्श समाज और आदर्श देश के निर्माण की सारी शिक्षाएं वाल्मीकि रामायण में हैं। रामचंद्र जी का जीवन वैदिक मर्यादा और सिद्धांतों का जीवन है जो आज भी हमें शिक्षा देता है और जब तक यह सृष्टि है तब तक शिक्षा देता रहेगा।
रामनवमी के अवसर पर ग्राम पल्ला में पांच दिवसीय अथर्ववेद पारायण महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है, जिसका समापन 29 मार्च को होगा । इस अवसर पर आयोजन समिति की ओर से वानप्रस्थी देव मुनि , महाशय रंगीलाल आर्य, विजेन्द्र सिंह आर्य, आचार्य कुंवरपाल शास्त्री, स्वामी सत्यव्रत,राजेंद्र आर्य, रविंद्र आर्य ,बेगराज आर्य, महेंद्र आर्य, एडवोकेट अजय आर्य, अनार आर्य, जीता आर्य , जयकरण भाटी, शिव मुनि, रामप्रसाद आर्य , वेदपाल सिंह चपराना आदि उपस्थित रहे।

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