मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 11 क…
मनु प्रतिपादित संस्कार और मौलिक अधिकार
महर्षि मनु ने मनुस्मृति के अंतर्गत सातवां अध्याय राजधर्म संबंधी दिया है। इस अध्याय में उन्होंने राजधर्म के संबंध में अपनी विधिक व्यवस्थाएं दी हैं। इन व्यवस्थाओं को उनके काल में श्लोक कहते थे। आज के संदर्भ में आप इन्हीं को विधिक व्यवस्था, प्रोविजन, धारा, अनुच्छेद , सेक्शन आदि भी कह सकते हैं। महर्षि मनु ने सातवें अध्याय के अतिरिक्त अन्य अध्यायों में जो कुछ दिया है, वह इस राजधर्म संबंधी अध्याय के साथ पठनीय है। क्योंकि अन्य अध्याय राजधर्म संबंधी इस अध्याय के पूरक हैं । उन्होंने जिस प्रकार मौलिक अधिकारों का वर्णन किया है, वह बहुत व्यापक चिंतन के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार उन्होंने अन्यत्र देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को चारों आश्रमों और चारों वर्णों के लोगों के कर्तव्य कर्मों के रूप में स्थापित किया है। जिनका उन्होंने बड़ा विस्तृत वर्णन किया है।
मनुस्मृति का पहला अध्याय
उदाहरण के रूप में मनुस्मृति के पहले अध्याय में जिस प्रकार उन्होंने सृष्टि – उत्पत्ति,जगत- उत्पत्ति के क्रम, प्रकृति से महतत्व आदि तत्वों की उत्पत्ति, पंचमहाभूतों की सृष्टि का वर्णन, वेदों का आविर्भाव, आकाश आदि की उत्पत्ति, मन्वंतर का काल परिमाण,उत्तरायण – दक्षिणायन, परमात्मा की सुषुप्तावस्था में जगत की प्रलय अवस्था, चारों वर्णों के कर्म, धर्म के मूल स्रोत और आधार ,आत्मा के अनुकूल धर्म का ग्रहण, धर्म जिज्ञासा में श्रुति परम प्रमाण, धर्म के चार आधार रूप लक्षण आदि को स्थान दिया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने गूढ़ रहस्यों को जानना व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना है अर्थात इस प्रकार के गूढ़ ज्ञान पर किसी वर्ण विशेष का एकाधिकार नहीं है ? जितना ऊंचा ज्ञान मनुष्य को प्राप्त होता जाता है, उतनी ही उसकी बुद्धि निर्मल होती जाती है। संसार के विषय भोगों से वह हटता जाता है। उसके भीतर विवेक और वैराग्य की उत्पत्ति होती है। जिससे वह संसार में अपने आने के लक्ष्य को अर्थात मोक्ष को समझ लेता है। जितना ही वह ब्रह्म विद्या के रहस्यों के बारे में जानता चला जाता है, उतना ही उसकी बुद्धि पवित्र होती चली जाती है। सूक्ष्म होती चली जाती है। यही कारण है कि उपनिषदों को पढ़ने से बुद्धि सूक्ष्म होती है। उपनिषद का अभिप्राय रहस्य से ही है। इस प्रकार ब्रह्म विद्या के रहस्य को जानकर या उसके बारे में समझकर हमारी बुद्धि में सूक्ष्मता का प्रवेश होता जाता है। जिससे गंभीर से गंभीर विषयों को समझने में हमें सुविधा होने लगती है। जैसे-जैसे सूक्ष्म विषय हमारी समझ में आते जाते हैं वैसे-वैसे ही संसार के विषयों से हमारी निवृत्ति होती जाती है।
इस प्रकार मुक्ति की प्राप्ति करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस मौलिक अधिकार पर संसार के विषय भोगों के पड़े हुए आवरण को हटाने के लिए राजा को उस उत्तम विद्या का प्रबंध गुरुकुलों के माध्यम से करना चाहिए जिससे संसार के लोगों का कल्याण हो सके। यदि मुक्ति व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य है तो ब्रह्म विद्या प्राप्त करना भी उसका मौलिक अधिकार है। जिसके लिए मनुस्मृति की जीवन व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को अपनाना आवश्यक है।
ज्ञान प्राप्ति मनुष्य का पहला मौलिक अधिकार
वेद विद्या सब के लिए उपलब्ध है, इसलिए सभी के लिए जानने योग्य है। जानकर ज्ञान का प्रचार – प्रसार करना और सभी को विद्वान बनाना, प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य – कर्म अर्थात धर्म है। ज्ञान पर किसी का पहरा नहीं,यह सब के लिए उपलब्ध है – यह मनुष्य का मौलिक अधिकार है। भारतीय संविधान ही नहीं, संसार के प्रत्येक देश का संविधान इस प्रकार की विस्तृत ज्ञान- परंपरा के संबंध में मौन है। भारत को यथाशीघ्र अपने संविधान में संशोधन करके यह व्यवस्था करनी चाहिए कि आत्मोन्नति के लिए वेद ज्ञान की प्राप्ति करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
महर्षि मनु ने दूसरे अध्याय में जिस प्रकार संस्कारों,वेद अध्ययन, यज्ञ, व्रत आदि से ब्रह्म की प्राप्ति, वर्ण के अनुसार दंड विधान, दण्डों का वर्ण के अनुसार मान, दण्डों का स्वरूप, भोजन संबंधी आवश्यक विधान, ब्रह्मचारी की शिक्षा, गुरु शिष्य संबंध, आचार्य के लक्षण, जितेंद्रिय की परिभाषा, वर्ण के बारे में विशेष उल्लेख, गुरु पत्नी के साथ ब्रह्मचारियों का व्यवहार आदि विषयों पर जिस प्रकार का प्रकाश डाला है, वह अपने आप में अद्वितीय है। इस प्रकार की विधि व्यवस्था हमारे धर्म का निरूपण करती है। किस परिस्थिति में हमें किस प्रकार का आचरण अपनाना है, ज्ञान देने वाले गुरु के प्रति हमें किस प्रकार श्रद्धा पूर्ण व्यवहार रखना है ? आदि की व्यवस्थाएं आज के संविधान में कहीं पर भी स्थापित नहीं की गई हैं। यह आवश्यक नहीं है कि विधिक व्यवस्थाओं का अंतिम परिणाम दंड देना ही होता है, विधिक व्यवस्थाओं का अंतिम उद्देश्य मानव के व्यवहार में, उसकी जीवन शैली में सुधार करना होता है। इस सुधार का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को सुधारते – सुधारते देवत्व तक पहुंचाना होता है। इससे आगे उसके लिए मुक्ति का मार्ग अपने आप उपलब्ध हो जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था पर हमारा संविधान मौन साध गया है। इसका अभिप्राय हुआ कि मनुष्य की आत्मिक उन्नति के बारे में अर्थात उस शाश्वत समस्या के समाधान के बारे में हमारा संविधान मौन हो गया जिसे लेकर सृष्टि के प्रारंभ से मनुष्य साधना संघर्ष करता रहा है। जिसके लिए वह उन राक्षस्त लोगों से अपनी रक्षा चाहता है, जो उसकी आत्मिक उन्नति में बाधक होते हैं। मनुष्य की भौतिक देह की रक्षा करने पर तो फिर भी कहीं कुछ संविधान या देश का कानून कहता है, परंतु आत्मिक उन्नति करते-करते मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा की पूर्ति के बारे में देश का संविधान और कानून मौन है।
भारत की यज्ञमयी संस्कृति
मानव जीवन जितना अधिक सुसंस्कृत और परिष्कृत होगा, उतना ही वह दूसरों के लिए कल्याणकारी होगा। दूसरों से कोई विरोध न हो – इसका सबसे अच्छा उपाय है कि आप दूसरों के भले के लिए काम करना आरंभ कर दीजिए। इसी को भारत की ‘ यज्ञमयी संस्कृति ‘ कहते हैं। इस संस्कृति का उद्देश्य है कि दूसरों के जीवन में सुगंध भरो। जो लोग दूसरों के जीवन की सुगंध को समाप्त करने का काम करते हैं और अपने जीवन को सुगंधित करने की युक्ति खोजते रहते हैं, वही जीवन और संसार के लिए भार बन जाते हैं। क्योंकि उनका जीवन मानव जीवन न होकर पशु का जीवन होता है।
दूसरों के जीवन को सुगंधित करना ही मानवता है। दूसरों के जीवन को दुर्गंध करना ही दानवता है। मानव जीवन का उद्देश्य है कि वह सुगंध से प्रेम करे दुर्गंध से नहीं। सुगंध का विस्तार करें दुर्गंध का नहीं।
यदि दूसरों के जीवन में सुगंध नहीं भर सकते हो तो कम से कम दुर्गंध तो मत फैलाओ। यदि आप दूसरों के जीवन में सुगंध भरने का काम करते हैं तो आपके अपने जीवन में सुगंध अपने आप भर जाएगी। निजी स्वार्थ को परमार्थ पर न्योछावर कर देना हर किसी के वश की बात नहीं होती, इसके लिए साधना करनी पड़ती है। जीवन को साधना पड़ता है। संस्कारित बनाना पड़ता है। उसका परिमार्जन करना पड़ता है। आप डंडे से किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि तुम्हें दूसरों के खेतों के फूल उजाड़ने नहीं हैं। हां, उसे आप संस्कारित बनाकर इस बात के लिए प्रेरित कर सकते हैं कि दूसरों के खेतों के फूल नहीं उजाड़ने चाहिए।
मनुष्य का संस्कारित जीवन और मनु
इस बड़ी बात को महर्षि मनु ने संस्कारित जीवन के माध्यम से करवाने के लिए मानव समुदाय को प्रेरित किया। सबको बताया कि जीवन को लोक कल्याण के लिए समर्पित करो। यह ध्यान रखना चाहिए कि जीवन लोक कल्याण के लिए तभी समर्पित होगा, जब पहले दिन से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक वह संस्कारों की प्रवृत्ति में ढला रहेगा।
संस्कार व्यक्ति का ही नहीं राष्ट्र का भी निर्माण करते हैं। संस्कारों से युक्त जीवन ही मौलिक अधिकारों की गारंटी हो सकता है। क्योंकि ऐसा जीवन ही मनुष्य समाज को दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने की शिक्षा देता है।
महर्षि मनु ने संसार पर उपकार करते हुए 16 संस्कारों का विधान किया। उन्होंने इस बात को भली प्रकार समझा कि मानव का जीवन किसी ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राप्त हुआ है। महर्षि मनु ने 16 संस्कारों का विधान करते हुए उनके पड़ाव भी निश्चित किये। गर्भाधान संस्कार से लेकर अंतिम संस्कार तक इन 16 संस्कारों को कब करना है ? – यह सब विस्तारपूर्वक समझाया।
जबकि मानव मन संसार में आकर संकल्प -विकल्प के हिचकोले लेता रहता है। अध्यात्म के क्षेत्र में मानव मन की बड़ी महिमा गाई गई है और इसे उतना बुरा नहीं माना गया जितना इस संसार में मान लिया जाता है। अध्यात्म क्षेत्र के अनुभवी लोगों का कहना है कि मन चंचल नहीं होता , क्योंकि यह जड़ है। परंतु यह भी अनुभूति का विषय है कि संकल्प और विकल्प मन में ही जन्म लेते हैं और जब वह इन दोनों की ओर अर्थात कभी इधर कभी उधर छलांग लगाने का कार्य करता है तो इसी को लौकिक भाषा में मानव मन की चंचलता कह दिया जाता है। किसी महान तपस्वी के द्वारा ही मानव मन की चंचलता को शांत किया जा सकता है। इसकी चंचलता पर अधिकार स्थापित करना हर किसी के वश की बात नहीं है। इसे साधना के माध्यम से धीरे-धीरे ही वश में किया जाता है। इसे वश में कर लेना इंद्रियों को वश में कर लेना होता है। इसका परिणाम यह होता है कि ऐसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति फिर सांसारिक विषय भोगों में नहीं भटकता । वह संसार की एषणाओं से मुक्त हो जाता है और आत्म विजयी होकर संसार में निर्भीक विचरता है। उसे किसी भी प्रकार की सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सुरक्षा उन लोगों को चाहिए जो पाप करते हैं।
संसार की टूटन के उपचारक लोग
निष्पाप व्यक्ति निडर होकर संसार में भ्रमण करता है। वह समाज को तोड़ने की प्रवृत्तियों में कभी सम्मिलित नहीं होता। परिवार से लेकर राष्ट्र तक जहां-जहां वह टूटन देखता है, वहीं- वहीं वह रुककर उस टूटन का उपचार करने लगता है। इस प्रकार ऐसे आत्मविजयी लोग संसार में टूटन के चिकित्सक अथवा उपचारक बनकर घूमते हैं। जैसे- जैसे उनकी साधना फलीभूत होती चली जाती है वैसे – वैसे ही लोग उनके प्रति श्रद्धा से झुकते चले जाते हैं। यही लोग वास्तविक अर्थों में अतिथि होते हैं और ऐसे लोगों को ही “अतिथि देवो भव ” की परंपरा में लोग पूजा करते हैं।
इन लोगों के कारण धरती पर दिव्यता बिखरती है। सौंदर्य बिखरता है और सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है।
हमारे देश की परंपरा रही है कि चिकित्सकों और अध्यापकों को समाज के लोग विशेष सम्मान दिया करते हैं। इसलिए समाज की टूटन को समाप्त कर जोड़ने में लगे हुए ऐसे ‘ भूसुरों ‘ को भी लोग विशेष सम्मान देते हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हुआ करते थे जो मानव मन की टूटन से लेकर राष्ट्र की टूटन तक का उपचार किया करते थे। उनका उपचार भी नि:शुल्क हुआ करता था। इस प्रकार वह राष्ट्र साधना में सीधे सम्मिलित हुआ करते थे। राष्ट्र निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका होती थी। नि:स्वार्थ भूमिका होती थी।आज के स्वार्थी परिवेश ने समाज में इस प्रकार के मानव समाज का निर्माण करना ही बंद कर दिया है। यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि आज की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, आध्यात्मिक व्यवस्था ही स्वार्थ पूर्ण है। इसीलिए यह सब कुछ हो रहा है अथवा जो कुछ अच्छा हो रहा था – वह होना बंद हो गया है। यह मनु को भुला देने का परिणाम है। हमें अपने संविधान में यह प्राविधान करना पड़ेगा कि मनु सहित हम अपने उन सभी महान पूर्वजों का सम्मान करते हैं, जिन्होंने भारत की वैदिक संस्कृति को मानव समाज के लिए हितकारी बनाने में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है।
स्वार्थ भाव की राजनीति और समाज
आज राष्ट्र निर्माण में उस व्यक्ति की भूमिका है जो राष्ट्र निर्माण में दिए जा रहे अपने योगदान का वेतन के रूप में कुछ ना कुछ प्रतिफल लेता है अथवा इसके बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करता है। आजकल नि:स्वार्थ भाव से तो लोग राजनीति में भी नहीं आते। वहां पर भी लोग कमाई करने के लिए जा रहे हैं । मनु महाराज के धर्म ग्रंथ मनुस्मृति के अनुसार राजनीति राष्ट्रनीति हुआ करती थी। जिसमें लोग नि:स्वार्थ भाव से ही सम्मिलित हुआ करते थे । आज राजनीति एक व्यवसाय हो गई है। यह आवश्यक नहीं है कि आप राजनीति में जाकर जनप्रतिनिधि, मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही बनें ? अनेक ऐसे स्वार्थी लोग राजनीति में प्रवेश कर गए हैं जो इन सब के बिना भी करोड़ों- अरबों की संपत्ति एकत्र करने में सफल हो गए हैं। ऐसे मक्कार लोगों से राष्ट्र के लिए नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनु इस प्रकार के लोगों को कुसंस्कारी मानकर राजनीति से दूर रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सभासदों,मंत्रियों, राष्ट्रपति आदि के लिए जब योग्यताओं का विधान किया तो उसमें मनुष्य के चरित्र पर विशेष ध्यान दिया। मानव समाज के सुसंस्कृत होने पर बल दिया।
जब राजनीति ही समाज सेवी नहीं रही तो लोगों ने भी समाजसेवी होना छोड़ दिया। ऐसे समाज में ही मौलिक अधिकारों की आवश्यकता पड़ती है। धार्मिक समाज में मौलिक कर्तव्यों पर बल दिया जाता है और स्वार्थी समाज में अधिकारों पर बल दिया जाता है। भारत सहित अनेक देशों के संविधानों में मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया है। जहां-जहां मौलिक अधिकारों का विधान संविधानों में किया गया है, वहां-वहां हम आज तक भी धार्मिक अर्थात कर्तव्य परायण मानव समाज का निर्माण नहीं कर पाए हैं।इसका कारण यह है कि मौलिक अधिकारों को प्राप्त करने का संघर्ष मानव मन का भौतिकवादी पक्ष है और कर्तव्यपरायण मानव समाज का निर्माण करना आध्यात्मिक पक्ष है।
भौतिकवादी पक्ष में संघर्ष होता है जबकि आध्यात्मिक पक्ष में शांति होती है। भौतिकवादी पक्ष में भटकाव होता है,तनाव होता है। जबकि आध्यात्मिक पक्ष में गहन विश्रांति होती है। लगाव होता है।
मेरी ” मनुस्मृति और भारतीय संविधान ” नामक पुस्तक से
– डॉ राकेश कुमार आर्य
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