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मौलिक अधिकारों की व्यवस्था, एक निरर्थक खींचतान
भारत के संविधान निर्माताओं ने मनु को भुलाकर जिस नए भारत का निर्माण करना आरंभ किया, उस भारत में उनका संविधान गहन विश्रांति, लगाव और शांति वाले कर्तव्यपरायण मानव समाज का निर्माण करने में असफल हो चुका है। चारों ओर अधिकारों को प्राप्त करने और एक दूसरे की टांग खींचने की प्रवृत्ति प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। तो क्या यह माना जाए कि मौलिक अधिकारों का अध्याय संविधान में रखना एक निरर्थक खींचतान ही सिद्ध हुआ है ?
हमारा विचार है कि यह माना जा सकता है कि भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों का अध्याय रखना सचमुच एक निरर्थक खींचतान ही सिद्ध हुआ है। इसकी सार्थकता तब थी जब मानव मन को धार्मिक बनाया जाता। साधु बनाया जाता। मन के साधु बने बिना राष्ट्र का कल्याण नहीं हो सकता। समाज का सुधार नहीं हो सकता और मानव का उद्धार नहीं हो सकता। इसलिए यह आवश्यकता की मन को एक सच्चा साधक बनाया जाता। दूसरों के साथ मिलकर चलने वाला बनाया जाता। कर्तव्य परायण समाज के निर्माण करने से ही यह संभव था। दुर्भाग्य से हमारा संविधान इस विषय पर मौन साध गया और पहली सीढ़ी को लांघकर अगली सीढ़ी पर खड़ा होकर शोर मचाने लगा कि हम एक आदर्श समाज बनाने जा रहे हैं ? बिना किसी तैयारी के युद्ध में जाना आत्महत्या करना होता है।
संविधान भारत के संविधान में स्थापित किए गए मौलिक अधिकारों की उत्पत्ति भी संविधान निर्मात्री सभा के विद्वान सभासदों अथवा सदस्यों के मस्तिष्क की उपज नहीं थी। मौलिक अधिकारों को इंग्लैंड के बिल ऑफ राइट्स , संयुक्त राज्य अमेरिका का बिल ऑफ राइट्स और फ्रांस की मानवाधिकार घोषणा जैसे कई स्रोतों से प्राप्त किया गया और उन्हें भारत के संविधान में स्थान दे दिया गया।
भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार इस प्रकार हैं:-
समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
इसके संबंध में भारत का संविधान अनुच्छेद 14 में कहता है कि ” राज्य ,भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”
अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद करने का प्रतिषेध किया गया है। वहां पर कहा गया है कि राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।
यहीं पर यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड 2 की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। अनुच्छेद 16 में स्पष्ट किया गया है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।
अनुच्छेद 17 के माध्यम से अस्पृश्यता का अंत किया गया है। जबकि अनुच्छेद 18 के माध्यम से राज्य सेना या विधि संबंधी सम्मान के अतिरिक्त कोई उपाधि प्रदान नहीं की जाएगी।
अनुच्छेद 19 में सभी नागरिकों को वाक स्वतंत्रता आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण प्रदान किया गया है, अर्थात भाषण और अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
संविधान के अनुच्छेद 20 में अपराधों के लिए दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान किया गया है। कहा गया है कि कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्ध दोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय जो अपराध के रूप में आरोपित है ,किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या उससे अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिग्रहित की जा सकती थी।
अनुच्छेद 21 में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान किया गया है। संविधान की व्यवस्था है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैनिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।
अनुच्छेद 21 ( क ) में 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 22 ( 1 ) में किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के कारण से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरोध नहीं रखा जाएगा या अपनी रुचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा करने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।
भाग ( 2 ) में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को , जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरोध रखा गया है, गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी से 24 घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।
( ख ) में बताया गया है कि निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन गिरफ्तार या निरोध किया गया है । इसी प्रकार की कई व्यवस्थाएं अनुच्छेद 22 में स्थापित की गई हैं।
अनुच्छेद 23 में मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध किया गया है ।
जबकि अनुच्छेद 24 में कारखाने आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध किया गया है। 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।
अनुच्छेद 25 में अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है। व्यवस्था है कि लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।
अनुच्छेद 26 में धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का , अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का जंगल और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का ,और ऐसी संपत्तियों का विधि के अनुसार प्रशासन करने का नागरिकों को अधिकार होगा।
अनुच्छेद 27 में किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता प्रदान की गई है। स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे करों का संदाय करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिनके आगम किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय करने के लिए भी निर्दिष्ट रूप से विनियोजित किए जाते हैं।
अनुच्छेद 28 में कुछ शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता प्रदान की गई है। राज्य निधि से पूर्णतया पोषित किसी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
अनुच्छेद 29 में अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण करते हुए भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को जिसकी अपनी विशेष भाषा लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षण संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूल वंश ,जाति , भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 30 में शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों को विशेष अधिकार प्रदान किया गया है। धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।
मूल संविधानके अनुच्छेद 31 में संपत्ति का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया था। जिसे संविधान के 44वें संशोधन द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 32 में प्रावधान किया गया है कि इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को परिवर्तित करने के लिए प्रत्येक नागरिक के पास उपचार होगा। उच्चतम न्यायालय को ऐसे निर्देश या आदेश या रिट जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण परमादेश प्रतिषेध अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट है , जो भी समुचित हो निकालने की शक्ति होगी।
अनुच्छेद 33 में इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का, बलों आदि को लागू करने में उपांतरण करने की संसद की शक्ति को उल्लेखित किया गया है।
अनुच्छेद 34 में स्पष्ट किया गया है कि संसद विधि द्वारा संघ या किसी राज्य की सेवा में किसी व्यक्ति की या किसी अन्य व्यक्ति की किसी ऐसे कार्य के संबंध में क्षतिपूर्ति कर सकेगी जो उसने भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर किसी ऐसे क्षेत्र में जहां सेना विधि प्रवृत्त थी। व्यवस्था के बनाए रखने या पुनः स्थापना के संबंध में किया है या ऐसे क्षेत्र में सेना विधि के अधीन पारित दण्डादेश दिए गए दंड, आदिष्ट समपहरण या किए गए अन्य कार्यों को विधि मान्य कर सकेगी।
अनुच्छेद 35 में इस भाग के उपबंधों को प्रभावित करने के लिए विधान किया गया है।
इन मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 29 और 30 का विषय बहुत ही आलोचना का पात्र बना है । इनमें दी गई व्यवस्था के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को अपनी धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार होगा। जबकि अनुच्छेद 28 में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य निधि से पूर्णतया पोषित किसी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
इस प्रकार अनुच्छेद 29 और 30 की विषय वस्तु अनुच्छेद 29 की विषय वस्तु से विरोधाभासी लगती है। जिस अल्पसंख्यक वर्ग के कारण देश को विभाजन की पीड़ा झेलनी पड़ी, उसके लिए फिर से उसी शिक्षा को धार्मिक शिक्षा के नाम पर अपने शैक्षणिक संस्थानों में प्रस्तुत करने की स्वीकृति प्रदान करना उचित नहीं कहा जा सकता। विशेष रूप से तब जब इसी प्रकार की कथित धार्मिक शिक्षा ने एक वर्ग को राष्ट्र का विभाजन करने के लिए प्रोत्साहित किया हो।
( लेखक की यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है)
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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