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गुर्जरों की उत्पत्ति पर इतिहासकारों के मत
गुर्जरों की उत्पत्ति पर यदि विचार किया जाए तो गुर्जर अभिलेखों के अनुसार ये लोग सूर्यवंशी या रघुवंशी हैं।स्पष्ट है कि गुर्जर सूर्यवंशी या रघुवंशी अपने आप को यदि मानते हैं और उनके अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं तो इसका एक ही कारण है कि भारत का सबसे पहला क्षत्रिय राजवंश सूर्यवंश ही है । जो बाद में रघुवंश के नाम से भी जाना गया । इसी में श्री रामचंद्र जी का जन्म हुआ । इस प्रकार सूर्यवंशी या रघुवंशी गुर्जर समुदाय के लोग भारत के सबसे पहले क्षत्रिय राजवंश की परंपरा के ध्वजवाहक हैं।प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जरों को ‘रघुकुल-तिलक’ तथा ‘रघुग्रामिणी’ कहा है। इससे भी पता चलता है कि गुर्जर लोग सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंशी परंपरा के ही हैं । 7 वीं से 10 वीं शतब्दी के गुर्जर शिलालेखों पर सूर्यदेव की कलाकृतियाँ भी इनके सुर्यवंशी होने की पुष्टि करती हैं। राजस्थान में गुर्जरों को सम्मान से ‘मिहिर’ कहकर लोग आज भी बुलाते हैं । मिहिर का अर्थ भी सूर्य से ही है। राजस्थान के लोगों में यह परम्परा आज भी प्रचलित है कि गुर्जर लोग रघुवंशी अर्थात सूर्यवंशी हैं।कुछ इतिहासकारों की ऐसी भी मान्यता है कि ये गुर्जर लोग मध्य एशिया के कॉकस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।कुछ विद्वानों का ऐसा ही कहना है कि गुर्जर एक संस्कृत शब्द है । जिसका अर्थ ‘शत्रु का नाश करने वाला’ अर्थात ‘शत्रु विनाशक’ होता है। प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य में दहाड़ता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है।हमारी मान्यता है कि काकस , आर्मेनिया आदि से गुर्जरों के यहां आने को विदेशों से उनका आना माना जाना उचित नहीं है । इसके लिए यह देखने की आवश्यकता है कि जिस समय गुर्जर किसी भी क्षेत्र से भारत में आए उस समय वह देश अस्तित्व में था या नहीं ? या वह भारतवर्ष का ही एक भूभाग था।जिन इतिहासकारों ने गुर्जरों को विदेशी जाति माना है उनमें डॉक्टर डीआर भंडारकर का नाम सबसे पहले लिया जा सकता है। यद्यपि यतेंद्र कुमार वर्मा, रतन लाल वर्मा , गणपतसिंह , मुल्तान सिंह वर्मा , स्वामी वासुदेवानंद तीर्थ , गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डॉ दशरथ शर्मा , बी .एन. पुरी , सी. वी. वैद्य आदि विद्वान इस बात से सहमत नहीं हैं कि गुर्जर एक विदेशी जाति है। डॉक्टर डीआर भंडारकर गुर्जर्स पर शोध पत्र , जर्नल ऑफ दी बॉम्बे ब्रांच ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी खंड – 21 , पृष्ठ 411 पर अपने उक्त मत को व्यक्त करते हैं।डॉ भंडारकर और उनके मत का समर्थन करने वाले विद्वानों की मान्यता है कि गुर्जरों को ‘खजर’ जाति से जोड़कर देखा जाए । दूसरे , हूण गुर्जरों के साथ स्थायी रूप से बड़े पैमाने पर राजपूताना में बस गए थे – ऐसा भी स्वीकार किया जाए। डॉ भंडारकर और उनके साथियों के इस मत में कोई दम दिखाई नहीं देता । इन लोगों का खजर जाति का होना मात्र ही उनको गुर्जर के साथ स्थापित करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बन जाता । इसके अतिरिक्त हूणों के आक्रमण स्कंद गुप्त के काल में हुए हैं । उनका भी गुर्जरों की सामाजिक व्यवस्था के साथ कोई समन्वय स्थापित नहीं दीखता।
गुर्जर ईरानी मूल के थे ?
कुछ इतिहासकारों का ऐसा भी मानना है कि गुर्जरों का सम्बन्ध ईरानियों से रहा है , अर्थात गुर्जर ईरानी मूल के हैं । कैनेडी महोदय गुर्जरों को सूर्य का उपासक होने के कारण ईरानियों के साथ जोड़ने का बेतुका प्रयास करते हैं । उनका मानना है कि गुर्जर लोग ईरान से ही आए थे। हमारा मानना है कि कैनेडी महोदय की इस बात में भी कोई दम नहीं है। क्योंकि हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत सूर्योपासना करने वाले लोगों का देश रहा है । सूर्यवंशी शासक यहाँ पर सबसे पहले हुए । इसलिए सूर्य की उपासना करने वाले लोग केवल वही हो सकते हैं जो भारत की संस्कृति में विश्वास रखते हों और अपने आपको भारतीय पूर्वजों की सन्तान मानते हों ।हमारा मानना है कि ईरान स्वयं कभी एक ‘आर्यान’ प्रांत के नाम से जाना जाता था । यह कोई अलग देश नहीं था । ‘आर्यान’ प्रांत होने से इसका संबंध स्वयं ही आर्यों और उनकी संस्कृति से जुड़ जाता है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि ईरान के पूर्वज भी आर्य संस्कृति के ही उपासक थे और वे स्वयं भी आर्य ही थे । यदि उन आर्य लोगों में सूर्योपासना का विचार देर तक बना रहा तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । जब संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का शासन था तो आर्यान प्रांत पर भी उनका शासन था । इसलिए आर्यों की परम्पराएं वहां पर मिलती हैं तो इसका अभिप्राय यह नहीं हो जाता है कि आर्यान प्रांत से निकलकर कोई व्यक्ति यदि उस समय के अपने ही देश अर्थात आर्यावर्त में आ गया तो वह विदेशी हो गया । इसी बात को यदि कैनेडी महोदय इस प्रकार कहते कि भारत के आर्यों की ही सन्तानें ईरान में निवास करती थीं और ईरानी और गुर्जरों की बहुत सी बातें समान हैं , इसलिए यह दोनों एक ही वंश परंपरा के और एक ही संस्कृति के उत्तराधिकारी माने जाने चाहिए तो उनकी बात को माना जा सकता था । परंतु कहने का ढंग दूसरा होने से हम उनसे इस बात पर असहमत हैं । ईरान हमारे लिए विदेश नहीं था और वहां के लोगों की और भारत के लोगों की उस समय की परम्पराओं में कोई विशेष अन्तर भी नहीं था , दोनों एक थे , दोनों का कुल एक था , दोनों का वंश एक था , दोनों की परम्पराएं , दोनों की संस्कृति और दोनों का धर्म एक था । तब आज की कुछ समानताओं को देखकर वहां से गुर्जरों का निकास मानना सर्वथा अतार्किक ही है।
गुर्जर सीथियन मूल के थे ?
चंद्रबरदायी कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह अग्निकुंड से उत्पन्न हुए थे । जिनमें प्रतिहार , चालुक्य , चौहान और परमार क्षत्रिय वंश प्रमुख हैं । इस अग्निकुंड की चर्चा ‘हम्मीर रासो’ , ‘नैणसी री ख्यात’ , ‘वंशभास्कर’ में भी मिलती है ।अग्निकुंड की इस गाथा को सही मानकर डॉ भंडारकर , कर्नल टॉड , स्मिथ जैसे विद्वानों ने गुर्जरों का सम्बन्ध सिथियनों के साथ जोड़ने का प्रयास किया है।वास्तव में ‘अग्निकुंड की गाथा’ को भी गलत ढंग से समझने का प्रयास किया गया है । हमें यह समझना चाहिए कि अग्निकुंड से किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती । हाँ , अग्निकुंड पर बैठकर संकल्प अवश्य लिया जाता है । भारतीय इतिहास में ऐसे अनेकों अवसर आए हैं , जब क्षत्रिय लोगों ने अपने देश व धर्म की रक्षा के लिए अग्निकुंड के समीप बैठकर सौगंध उठाई है । कुछ ऐसा ही आबू पर्वत पर रचे गए इस यज्ञ के अवसर पर हुआ था । जब हमारे क्षत्रियों ने भारतीय देश , धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए एक महान संकल्प लिया था । वास्तव में यह अग्निकुंड की घटना हमारे उन चार क्षत्रिय कुलों की यशोगाथा को जन्म देने वाली घटना है जिसने आगे चलकर भारत के लिए बहुत क्रांतिकारी कार्य किया , यद्यपि इसे इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया गया।
अग्निकुंड की इस कहानी पर राजस्थान के इतिहासकार श्री देवीसिंह जी मंडावा लिखते हैं कि – “ जब वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियंत्रण में आ गया था और बुद्ध ने इसके विरुद्ध बगावत कर अपना नया बौद्ध धर्म चलाया तो शनै: शनै: क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म त्यागकर बौद्ध धर्मी बन गया । क्षत्रियों के साथ साथ वैश्यों ने भी बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया ।
क्षत्रियों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात उनकी वैदिक परम्परायें भी नष्ट हो गई और वैदिक क्षत्रिय जो कि सूर्य व चंद्रवंशी कहलाते थे, उन परम्पराओं के सम्राट हो गये तथा सूर्य व चन्द्रवंशी कहलाने से वंचित हो गये । क्योंकि ये मान्यतायें और परम्परायें तो वैदिक धर्म की थी जिन्हें वे परित्याग कर चुके थे ।यही कारण है कि ब्राह्मणों ने पुराणों तक में यह लिख दिया कलियुग में ब्राह्मण व शुद्र ही रह जायेंगे व कलियुग के राजा शुद्र होंगे, बौद्ध के अत्याचारों से पीड़ित होकर ब्राह्मणों ने बुद्ध धर्मावलम्बी क्षत्रिय शासकों को भी शुद्र की संज्ञा दे डाली । दुराग्रह से ग्रसित हो उन्होंने यह भी लिख दिया कि कलियुग में वैश्य और क्षत्रिय दोनों लोप हो जायेंगे।
उस काल में समाज की रक्षा करना व शासन चलाना क्षत्रियों का उत्तरदायित्व था, चूँकि वे बौद्ध हो गये थे अत: वैदिक धर्म की रक्षा का जटिल प्रश्न ब्राह्मणों के सामने उपस्थित हो गया । इस पर ब्राह्मणों के मुखिया ऋषियों ने अपने अथक प्रयासों से चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त कर ली । आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया। यही अग्निकुंड का स्वरूप है ।वे प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी ही थे इसलिए बाद में शिलालेखों में भी तीन वंश अपने प्राचीन वंश का हवाला देते रहे लेकिन परमारवंश ने प्राचीन वंश न लिखकर अपने आपको अग्निवंश लिखना शुरू कर दिया ।
कुमारिल भट्ट ई.700 वि. 757 ने बड़ी संख्या में बौद्धों को वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य शुरू किया जिसे आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने पूर्ण किया । अत: इन चार क्षत्रिय वंशों को वैदिक धर्म में वापस दीक्षा दिलाने का कार्य उसी युग में होना चाहिए। आबू के यज्ञ में दीक्षा का एक
ऐतिहासिक कार्यक्रम था जो छठी या सातवीं सदी में हुआ है । यह कोई कपोल कल्पना या मिथ नहीं था , बल्कि वैदिक धर्म को वापस सशक्त बनाने का प्रथम कदम था जिसकी स्मृति में बाद में ये वंश अपने आपको अग्निकुंड से उत्पन्न अग्निवंशी कहने लग गये ।आज भी आबू पर यह यज्ञ स्थल मौजूद है ।”
वास्तव में अग्नि कुंड की यह घटना भारत के इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी घटना है , जब वैदिक संस्कृति के प्रति पूर्णत: समर्पित रहे आदि शंकराचार्य जी ने इस महान यज्ञ का आयोजन ,इस उद्देश्य से किया था कि भारत की संस्कृति को बचाने के लिए फिर से क्षत्रिय धर्म की स्थापना की जाए । क्योंकि वह इस बात को लेकर बहुत दुखी थे कि भारत की क्षत्रिय परंपरा को बौद्ध धर्म की अहिंसा का जंग लग चुका है । जिससे विधर्मियों को भारत पर आक्रमण करने का अवसर उपलब्ध होने लगा था । फलस्वरूप उन्होंने बौद्ध धर्म की अहिंसा के बढ़ते वर्चस्व पर लगाम लगाने के लिए और इस्लाम की खूनी तलवार का सामना करने के लिए इस यज्ञ का आयोजन इस उद्देश्य से कराया कि क्षत्रिय लोग फिर अपने आप को पहचानें और जो लोग देश , धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए अपने आप को समर्पित कर सकते हैं , वे अपना सर्वस्व देशहित न्यौछावर करने के उद्देश्य को लेकर सामने आएं।
गुर्जर वंश के लोगों ने देश धर्म की रक्षा के लिए अपने आप को न्यौछावर करने की इस परंपरा का निरंतर हर काल में निर्वाह किया। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनकी वंश परंपरा के लोगों ने निरंतर 300 वर्ष तक विदेशी हमलावरों को भारत भूमि की ओर देखने तक भी नहीं दिया। उस समय के जितने भर भी विदेशी हमलावर अरब की ओर से आने का प्रयास कर रहे थे ,वे सभी गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके वंशजों की वीरता के कारण भारत पर हमला करने का साहस नहीं कर पाए। देश धर्म के प्रति समर्पण का यही भाव हमें पृथ्वीराज चौहान और उनकी वंश परंपरा के लोगों के भीतर भी दिखाई देता है। पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर वंशी चौहान आज भी अजमेर के चारों ओर बड़ी संख्या में रहते हैं।
जो इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वीराज चौहान गुर्जर शासक थे।
तुर्कों के शासनकाल में भी गुर्जरों ने कश्मीर, उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिमी भारत की रक्षा के लिए अतुलनीय कार्य किया। जब भारत पर तैमूर लंग ने आक्रमण किया तो उसे समय भी गुर्जर वंश के लोगों ने अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए योगराज सिंह गुर्जर के नेतृत्व में 80000 वीरों की सेना का गठन किया। उसी समय रामप्यारी गुजरी ने भी अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए 40000 वीरांगनाओं की फौज तैयार की और देश की स्वाधीनता के लिए अनुपम कार्य किया। गुर्जर समाज के लोगों ने अपनी वीरता से यह दिखाया कि वह देश को लूटने वालों को किसी भी हालत में छोड़ेंगे नहीं। देश धर्म के लुटेरों को मिटा डालना ही आगे चलकर इस मुहावरे का आधार बना कि गुर्जर उजड़ देखकर राजी होता है अर्थात लुटेरों को उजाड़ देना गुर्जर का स्वभाव है।
1857 की क्रांति आई तो उस समय भी गुर्जर समाज ने बढ़ चढ़कर अपना योगदान दिया।धन सिंह कोतवाल उस समय योगराज सिंह गुर्जर और सम्राट मिहिर भोज के अवतार के रूप में प्रकट हुए। जिनके साथ देने के लिए बड़ी संख्या में गुर्जर वीर मैदान में उतर आए। इस प्रकार स्वामी दयानंद जी महाराज की प्रेरणा से गुर्जर समाज ने ही सबसे पहले देश की स्वाधीनता की हुंकार धन सिंह कोतवाल जी के नेतृत्व में भरी। यह क्रम रुका नहीं, निरंतर आगे बढ़ता रहा और देश एक दिन आजाद हुआ। आजादी के समय भी देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए गुर्जर वंश के महानायक सरदार वल्लभभाई पटेल जी ने अनुपम और अधिवक्तिया कार्य कर 563 रियासतों को एकता के सूत्र में पिरो दिया।
आज भी गुर्जर समाज के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में योगदान सहित इतिहास की गति को वीरता से भरने के उसके वंदनीय कार्यों पर शोध की आवश्यकता है।
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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