JD NEWS VISION….
मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 12 क…..
विधि, कानून -व्यवस्था और धर्म….
महर्षि मनु के द्वारा प्रतिपादित मनुस्मृति को ‘ धर्म ग्रंथ ‘ के रूप में मान्यता प्राप्त है। वैदिक विचारधारा के अनुरूप यदि कोई स्मृति है तो उसमें सर्वप्रथम नाम मनुस्मृति का ही है। इसके विषय में ‘ बृहस्पति स्मृति ‘ ( संस्कार खंड 13- 14 ) में लिखा गया है कि :-
” जो स्मृति मनुस्मृति के विरुद्ध है, वह सराहना के योग्य नहीं है । वेद के अर्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब में प्रधान और प्रशंसनीय है।”
दंड किसको मिले ?
मनु महाराज ने अपने इस महान ग्रंथ में विधि का प्रतिपादन किया । विधि ही कानून व्यवस्था कही जा सकती है और कानून व्यवस्था का अभिप्राय धर्म से है। जब हम विधि के पालन करने की बात कहते हैं या कानून व्यवस्था में विश्वास रखने की बात करते हैं या धर्म के प्रति आस्थावान होने की बात करते हैं, तब समझना चाहिए कि हम तीनों को एक ही अर्थ में प्रयोग कर रहे होते हैं। आज के धर्मनिरपेक्ष लोगों ने धर्म की व्याख्या करते हुए विधि, कानून-व्यवस्था और धर्म कुछ का कुछ अर्थ कर दिया है। कानून व्यवस्था को शांति व्यवस्था भी कहते हैं। शांति का अभिप्राय भी व्यवस्था से ही है। इस प्रकार शांति का भी एक निहितार्थ धर्म की व्यवस्था से ही है। व्यवस्था को ही सरकार कहा जाता है। कुल मिलाकर सरकार को चलाने का अर्थ भी धर्म और नीति के अनुसार कार्य करने से ही है। धर्मनिरपेक्षता का अभिप्राय होता है- कानून व्यवस्था में विश्वास न रखना, विधिक व्यवस्था में विश्वास न रखना और धर्म में आस्था न रखना। जो समाज इन तीनों के विरुद्ध विद्रोही हो जाता है, वह आत्मोन्नति के अपने सारे मार्ग बाधित कर लेता है,जो समाज धर्मनिरपेक्षता के इस अर्थ को स्वीकार कर लेता है, उसका विनाश निश्चित है और जो समाज इन तीनों के सही अर्थ को समझ कर चलता है – उसकी निरंतर उन्नति होना भी निश्चित है।
विधि, कानून – व्यवस्था और धर्म की व्यवस्था को चलाने के लिए दण्ड की व्यवस्था करनी पड़ती है। बिना दण्ड के कोई व्यवस्था चल नहीं सकती। जितना कड़ा दण्ड होता है समाज में शांति स्थापित रहने की उतनी ही अधिक संभावना होती है। कड़ा दण्ड होने का अभिप्राय बर्बरता और निर्दयता बरतना नहीं है। इसका अभिप्राय है सर्वप्रथम वास्तविक अपराधी को खोजना और फिर उसको उसके अपराध के अनुपात में उचित दण्ड देना। क्योंकि यह वेद की मान्यता है कि दंड उनको ही मिलना चाहिए जो दंड के भागी होते हैं अर्थात जो अपराधी होते हैं और शांति के शत्रु होते हैं। इसी को रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने ‘ भय बिनु होय न प्रीत ‘ कहा है।
की गई है तेजस्वी राजा की कामना
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट्।
स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥ ७॥
भावार्थ : वह राजा सामर्थ्य और शक्ति में इतना प्रभावशाली हो कि वह अपने तेज से शत्रुओं का अर्थात अपराधियों का उसी प्रकार विनाश कर दे, जिस प्रकार अग्नि विनाश करती है। उसके तेज के सामने कोई रुकने वाला न हो। यदि कोई हो तो उसतेजस्वी राजा के सामने झुकने वाला हो। उसका पराक्रम इतना प्रभावशाली हो कि कोई भी शत्रु उसका सामना न कर सके।
जिस प्रकार वायु गुप्त से गुप्त स्थान में भी प्रवेश करने में सफल हो जाता है, उसी प्रकार राजा के गुप्तचर भी प्रत्येक स्थान पर पहुंच रखने में सक्षम होने चाहिए। जहां-जहां अपराधी गतिशील दिखाई दें, वहां- वहां राजा के गुप्तचर उनका विनाश करने में देर न करें, अर्थात राजा का गुप्तचर तंत्र बहुत मजबूत होना चाहिए। उसे भेदने वाला कोई नहीं होना चाहिए। राजा को अपने राज्य के प्रत्येक क्षेत्र की जानकारी अपने गुप्तचरों के माध्यम से यथासमय सही-सही मिलती रहनी चाहिए। जिस प्रकार सूर्य समुद्र से जल ग्रहण करता है और उसकी किसी को पता भी नहीं पड़ने देता, उसी प्रकार राजा भी जब अपनी प्रजा से कर ग्रहण करे तो वह इतना कष्टरहित हो कि उसे देने में प्रजा को तनिक भी पीड़ा न हो।
राजा को अपने पूरे राज्य में इस प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए कि विद्या का प्रचार और अविद्या का विनाश हो। इसका अभिप्राय है कि प्रजा में कोई भी ऐसा न हो जो अशिक्षित हो, सभी शिक्षित हों। आज के संविधान के अंतर्गत सरकार लोगों को साक्षर करने पर जोर देती हैं। यह व्यर्थ का ही प्रयास है। जिसे दिखावटी उछल कूद के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता।
मनु महाराज राजा के द्वारा ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं कि चाहे शूद्र हो चाहे स्त्री हो, सभी को शिक्षा पाने का और वेद विद्या ग्रहण करने का समान अधिकार हो। इसके लिए किसी भी व्यक्ति का संप्रदाय, जाति अथवा लिंग बीच में नहीं आएगा।
राजा चंद्रमा के समान शांति और प्रसन्नता देने वाला हो। उसे देखकर सभी उसी प्रकार शांति और प्रसन्नता का अनुभव करें जिस प्रकार चंद्रमा को देखकर करते हैं।
जैसा जिसने किया है, वैसा ही उसका फल देना न्याय कहलाता है। इसलिए मनु महाराज कहते हैं कि राजा न्यायानुसार दण्ड देने वाला हो। राजा ऐश्वर्यप्रद परमेश्वर के समान समभाव से प्रजा का पालन-पोषण करने वाला हो। जलीय तरंगों या भंवरों के समान अपराधियों और शत्रुओं को बन्धनों या कारागार में डालने वाला हो। प्रत्येक अपराधी उसके दंड के प्रचंड प्रताप के समक्ष थर-थर कांपता हो। जिस राजा में इस प्रकार के गुण होते हैं, वही राजा वर्षाकारक शक्ति इन्द्र के समान सुख सुविधा का वर्षक – प्रदाता है।
स्वामी दयानंद जी महाराज राजधर्म संबंधी सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 6 में इस श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं कि – ” जो अपने से अग्नि, वायु, सूर्य, सोम, धर्म, प्रकाशक, धनवर्द्धक, दुष्टों का बन्धनकर्ता, बड़े ऐश्वर्य वाला हो वही सभाध्यक्ष सभेश होने योग्य होवे।”
कानून का पालन सभी के लिए अनिवार्य
मनु महाराज कहते हैं कि राजा के द्वारा बनाई गई विधि अथवा कानून अथवा धर्म का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता है। यदि कोई भी व्यक्ति अपने आप को विधि, कानून और धर्म से ऊपर मानेगा तो वह राष्ट्ररूपी देह में कोढ़ में खाज के समान होगा। उनका कथन है कि :-
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्म न विचालयेत् ॥ वि० मनुस्मृति ॥
भावार्थ : राजा अपने राज्य की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए विधि का निर्माण करता है, वह विधि लोगों पर कानून और धर्म के रूप में शासन करती है। यह उन लोगों के लिए कठोर होती है जो इसका पालन नहीं करते हैं और जो इसका स्वाभाविक रूप से पालन करते हैं, उनके लिए यह माता के समान दूध पिलाने वाली होती है। मनु महाराज कहते हैं कि वह राजा पालनीय विषयों में आवश्यकतानुसार जिस धर्म अर्थात् कानून का निर्धारण करे और अपालनीय विषयों में जिसका निषेध करे उस धर्म अर्थात् कानून व्यवस्था का उल्लंघन कोई न करे। यदि कोई विधि, कानून- व्यवस्था और धर्म का उल्लंघन करेगा तो वह उसके स्वयं के लिए ही घातक होगा। कोई डकैत अथवा बदमाश कानून का उल्लंघन करता है तो उसे दंड भी भोगना पड़ता है। इसी प्रकार कोई छली कपटी व्यक्ति धर्म की हानि करता है तो उसे भी दंड भुगतना पड़ता है।
आज के कानून में कहीं पर भी कानून अथवा लॉ का समन्वय धर्म के साथ स्थापित नहीं किया गया है । इसका अभिप्राय है जितने भर भी लोग विधि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं अथवा कानून निर्माण का काम कर रहे हैं, वे सभी विधि कानून और धर्म के परस्पर समन्वय संबंध के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते । इसका एक कारण यह भी है कि आज के इन तथाकथित कानून निर्माण करने वाले लोगों का संस्कृत से कभी कोई संबंध नहीं रहा। इसलिए ये शब्द की उत्पत्ति, उसकी गरिमा उसके महत्व के बारे में नहीं जानते।
दण्ड की सृष्टि और उपयोग विधि-
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम्।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत् पूर्वमीश्वरः ॥ ( वि० मनु०)
भावार्थ : दण्ड के माध्यम से सारी सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से होता है। इसलिए परमपिता परमेश्वर ने ही अपनी व्यवस्था में दण्ड की व्यवस्था की है। परमेश्वर स्वयं जीवों के कर्म के अनुसार उनको कर्म फल प्रदान करता है। कोई भी कर्म संसार का ऐसा नहीं है, जिसका फल जीव को प्राप्त नहीं होता हो और कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो अपने किए का फल नहीं पाता हो। मनु महाराज इस श्लोक के माध्यम से हमको बता रहे हैं कि राजा भी अपनी प्रजा में अपराधी लोगों को उनके अपराध का दण्ड देता है। उस राजा के प्रयोग के लिए सृष्टि के प्रारम्भ से ही ईश्वर ने सब प्राणियों की सुरक्षा करने वाले ब्रह्मतेजोमय अर्थात् शिक्षाप्रद और अपराधनाशक गुण वाले धर्मस्वरूपात्मक न्याय के प्रतीक दण्ड को रचा अर्थात् दण्ड देने की व्यवस्था का विधान किया है और उसे यह अधिकार वेदों ने दिया है। न्याय की रक्षा दण्ड से ही होती है। बिना दण्ड के सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था चल नहीं सकती।
महर्षि मनु जो कुछ भी कहते हैं वह वेद की व्यवस्था के अनुसार कहते हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि मनु महाराज वेद की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए ही अपने विधान की रचना कर रहे थे। उन्होंने धर्म की व्यवस्था को वेद की व्यवस्था के अनुसार आगे चलाने के लिए मनुस्मृति की रचना की। राजा से अपेक्षा की जाती है कि वह धर्म की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सही समय पर दण्ड का प्रयोग अवश्य करे। दण्ड के प्रयोग से ही राष्ट्र में शांति रहती है। समृद्धि को पंख लगते हैं और सर्वत्र सुख की वर्षा होती है। दण्ड से ही जनसाधारण का जीवन सुरक्षित रहता है और दण्ड से ही अपराध पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। जिस देश का राजा दण्ड के प्रयोग में शिथिलता बरतता है वह देश नष्ट हो जाता है।
नोट : लेखक की यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
Jd News Vision