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मॉरीशस की स्वतन्त्रता-प्राप्ति में आर्यसमाज का योगदान
डॉ० उदय नारायण गंगू, जी.ओ.एस.के., आर्य रत्न
नोट : डॉ० उदय नारायण गंगू, ,( जी.ओ.एस.के., आर्य रत्न ) जी वास्तविक अर्थों में आर्य रत्न हैं। वह आर्य सिद्धांतों के प्रति समर्पित हैं। भारत और मॉरीशस के सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में उनका विशेष योगदान है। अक्टूबर नवंबर 2025 में जब अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन रोहिणी नई दिल्ली में संपन्न हुआ था तो उस समय भी वह भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ मंच सांझा कर रहे थे। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में भी कीर्तिमान स्थापित किया है। उनके व्यक्तित्व से हम सब प्रेरणा ले सकते हैं। उन्हीं की लेखनी से यह लेख लिखा गया है, जो हमको बहुत कुछ सोचने के लिए प्रेरित करता है – संपादक
-आर्यसमाज के संस्थापक, महर्षि दयानन्द सरस्वती प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतीयों को बताया था कि स्वतन्त्रता वरदान है और परतन्त्रता अभिशाप। वे अपने अमर ग्रन्थ, सत्यार्थप्रकाश में बड़े स्पष्ट शब्दों में बताते हैं “कोई कितना ही करे, परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तरों के आग्रह रहित अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।”
(अष्टम समुल्लास)
महर्षि दयानन्द ने राजनैतिक सुधार की ओर देशवासियों का ध्यान आकृष्ट किया । उनका कथन है कि जात-पाँत, भेद-भाव और उच्च-नीच की भावना के कारण देश में फुट की बेल फैलती जाती है तथा विदेशी शासक इससे पूरा लाभ उठाते हैं। महर्षि ने हिन्दुओं में प्रचलित छूत-छात का खण्डन करते हुए लिखा “इसी मूढ़ता से इन लोगों ने चौका लगाते-लगाते, विरोध करते-कराते सब स्वातन्त्र्य, आनन्द, धन, राज्य, पिद्या और पुरुषार्थ पर चौका लगाकर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।” (दशम समुल्लास)
मॉरीशस को सत्यार्थप्रकाश की देन
बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना के सत्ताईस वर्ष पश्चात् अर्थात् सन् 1902 में मॉरीशस निवासी श्री खेमलाल लाला जी को सत्यार्थप्रकाश की प्राप्ति हवलदार भोलानाथ तिवारी जी के ग्वाले द्वारा हुई। इस कालजयी ग्रन्थ के आलोक से आलोकित कुछ प्रगतिशील व्यक्तियों के प्रयास से मॉरीशस में आर्यसमाज की स्थापना हुई। ज्यों-ज्यों सत्यार्थप्रकाश का प्रचार-प्रसार होता गया, त्यों-त्यों धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कुरीतियाँ दूर होती गईं। अविद्या और अन्धविश्वास दूर होता गया। जात-पाँत की दलदल से निकलकर हिन्दू आर्यसमाज की छत्र-छाया में संगठित होते गए। हिन्दुओं में राजनीतिक चेतना उत्पन्न हुई। बहुसंख्यक हिन्दुओं को वयस्क मताधिकार पाने और देश के आम चुनावों में मतदान करने के लिए आर्यसमाज ने जागरण का मन्त्र दिया। सन् १९४८ में, नये संविधान के अनुसार जो नागरिक साक्षर थे, वे मतदाता बन सकते थे। मॉरीशस में बोली जाने वाली किसी भी भाषा में साक्षर व्यक्ति को मतदान करने का अधिकार दिया गया ।
मॉरीशस में नवयुग की सृष्टि करने में आर्यसमाज ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस सन्दर्भ में क्षितीश वेदालंकार की उक्ति अक्षरशः सत्य है, यथा- “बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक मॉरीशस के प्रवासी भारतीयों में कोई राजनैतिक चेतना नहीं थी। इसके कुछ कारण आन्तरिक थे और कुछ बाह्य । बाह्य कारणों में प्रमुख थे साम्राज्यवादियों द्वारा उपनिवेशीकरण और गोरे ज़मींदारों द्वारा दमन की प्रवृत्ति। आन्तरिक कारण भी कम महत्पूर्ण नहीं थे। वास्तव में तो किसी जाति की पराधीनता का कारण यदि आत्मअवमानना होता है, तो स्वाधीनता का कारण होता है, आत्म-विकास। पराधीन भारत से जो लोग प्रवासी बनकर गए थे, वे अपने साथ इसी आत्म-अवमानना की भावना को साथ लेकर गए थे। ऊपर से अविद्या के कारण वे अन्ध विश्वासों के शिकार थे। गरीबी की मार पहले से थी ही। सामाजिक असमानता और छूआ-छूत की भावना ने कभी सामाजिक रूप से उन्हें संगठित होने ही नहीं दिया। धार्मिक संकीर्णता उनको ऊपर उठने ही नहीं देती थी। यद्यपि मॉरीशस में आने वाले प्रवासी राम, कृष्ण और हनुमान को भूले नहीं थे, न ही भूले थे वे रामायण और महाभारत को। प्रत्युत संकट की घड़ियों में उन्हें ‘निर्बल के बलराम’ ही दिखाई देते थे। निर्बल आत्माओं को सबल बनाने वाले राम के नाम को जीवित जागृत रखने में तुलसी रामायण का महत्व भी कम नहीं है। पर प्रसुप्त प्रवासियों को झकझोर कर जगाने में और उन्हें नवयुग की आवश्यकताओं के अनुसार सन्नद्ध करने में जो भूमिका आर्यसमाज ने निभाई है, वह किसी और के द्वारा संभव नहीं हुई ।” (स्मारिका सार्वदेशिक आर्य महासम्मेलन मॉरीशस, सन् १९७४, १०९)
आर्यसमाज की प्रथम स्थापना सन् १९०३ में हुई। आर्यसमाज ने गाँव-गाँव में कन्या पाठशालाएँ और आर्यसमाज की शाखाएँ स्थापित करके पैंतालीस वर्ष तक हिन्दी पढ़ाकर बहुत-से लोगों को साक्षर बना दिया था। परिणामस्वरूप सन् १९४८ के चुनाव में मतदाताओं की संख्या इकहत्तर हज़ार हो गई, जबकि उससे पूर्व के निर्वाचन में मात्र ग्यारह हज़ार मतदाता थे। चुनाव का नतीजा यह हुआ कि १९ निर्वाचित उम्मीदवारों में ११ हिन्दू थे। सन् १९४८ से सन् १९६७ तक स्वतन्त्रता के लिए जो संग्राम हुआ, उसमें आर्यसमाजियों ने हिन्दू नेताओं को पूरा सहयोग दिया ।
मॉरीशस की स्वतन्त्रता के लिए आर्यों का राजनीतिक नेताओं का समर्थन
मॉरीशस की स्वतन्त्रता के लिए नेताओं को बड़ा संघर्ष करना पड़ा। सन् १९६३ के आम चुनाव में स्वतन्त्रता-विरोधी दल, ‘पार्ची मोरिसियें’ की शक्ति बढ़ गई और मज़दूर दल की शक्ति घट गई। स्वतन्त्र अग्रगामी दल (I.F.B.) के नेता श्री सुखदेव विष्णुदयाल (प्रचलित नाम बिसुनदियाल) के सुझाव पर मज़दूर दल ने संयुक्त मंत्रीमण्डल बनाया। मॉरीशस की विभिन्न जातियों के बीच कटुता बढ़ती गई। बाद के वर्षों में दंगे हुए और कई जानें गईं।
यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि सुखदेव विष्णुदयाल का पालन-पोषण आर्यसमाज की गोद में हुआ था। वे १९२५ में गठित आर्य कुमार सभा के कर्मठ सदस्य थे। आर्यसमाज प्रजातान्त्रिक प्रणाली से नियमित रूप से अपनी प्रबन्धकारिणी समिति के सदस्यों के निर्वाचन का वार्षिक चुनाव करता रहा है। सुखदेव ने आर्यसमाज से ही प्रजातन्त्र की विशेषता का पाठ पढ़ा था। वे इसी प्रजातन्त्र के पोषक बनकर राजनीतिक क्षेत्र में कूद पड़े थे।
मज़दूर दल के नेता डॉक्टर शिवसागर रामगुलाम आर्यसमाज से बड़े प्रभावित थे। भारत में आयोजित ग्यारहवाँ आर्य महासम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था-
“आर्यसमाज का संगठन आश्चर्यजनक है, जो भारत से बाहर समुद्रतटों तक फैला हुआ है। आर्यसमाज के संगठन के अन्तर्गत उसके प्रबन्ध में समाज के प्रत्येक सदस्य का हाथ रहता है। आधुनिक काल में आर्यसमाज ही अकेला वह धार्मिक संगठन है, जिसका संविधान प्रजातन्त्रीय प्रणाली पर निर्मित हुआ था, यह प्रणाली उत्कृष्ट और निकृष्टतम शासन प्रणाली है। यदि इसका संचालन निस्सन्देह और चरित्रवान् व्यक्तियों द्वारा हो तो यह वरदान बन जाती है और यदि यह स्वार्थी और चरित्रहीन व्यक्तियों के हाथों में पड़ जाय तो यह अभिशाप बन जाती है। जिन क्षेत्रों में आर्यसमाज का वर्चस्व कायम है, वहाँ इसने सार्वजनिक जीवन में चार चाँद लगा दिये हैं। जहाँ इसकी जड़ें गहरी गयी हुई हैं, वहाँ जागृति व्याप्त है। परन्तु आर्य जनों को उन बुराइयों से सावधान रहना चाहिये, जो प्रजातन्त्र प्रणाली में घुस जाती है। उन्हें अपने व्यवहार से यह सिद्ध करते रहना चाहिए कि प्रजातन्त्र प्रणाली सर्वोत्तम शासन प्रणाली है।” (आर्योदय शुक्रवार १ सितम्बर १९७२, पृ० ९)
सात अगस्त १९६७ को वह ऐतिहासिक चुनाव हुआ, जिसे लड़ने के लिए एक तरफ़ परतन्त्रता का पक्षधर दल पी.एम.एस.डी. (PMSD) – अखाड़े में उतरा था और दूसरी ओर स्वराज्य की माँग करने वाली ‘स्वतन्त्र पार्टी’। ‘स्वतन्त्र पार्टी’ के अन्तर्गत ‘मज़दूर दल’, स्वतन्त्र अग्रगामी दल (Independent Forward Block) और मुस्लिम कार्रवाई समिति (CAM) के उम्मीदवार थे। तीनों दलों को विधान सभा की तिरालीस सीटें मिलीं और स्वतन्त्रता-विरोधी को सताईस । मंत्रीमण्डल बना। विधान सभा की बैठक में मॉरीशस को स्वराज्य देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसका पी.एम.एस.डी. के सदस्यों ने ज़ोरदार विरोध किया ।
सुखदेव विष्णुदयाल ने शिवसागर रामगुलाम का साथ दिया और स्वराज्य के प्रस्ताव का ज़ोरदार समर्थन किया। २२ अगस्त १९६७को मॉरीशस को स्वतन्त्र करने का प्रस्ताव पारित हो गया, जिसके फलस्वरूप १२ मार्च १९६८ को मॉरीशस की राजधानी पोर्टलुई के शाँ-दे-मार्स के मैदान में नीले गगन के नीचे विशाल जन-समूह के बीच मॉरीशस का चौरंगा झण्डा फहराया गया।
सुखदेव विष्णुदयाल जी १९२५ में भारत से आये वैदिक विद्वान् जयमिनी मेहता से बड़े प्रभावित हुए थे। उनमें आर्यसमाज का संस्कार कूट-कूट कर भरा हुआ था। उन्होंने भारत के स्वतन्त्रता सेनानियों से भी प्रेरणा ग्रहण की थी। यही कारण है कि जब मॉरीशस की स्वतन्त्रता का प्रश्न उठा तब विपक्ष दल के नेता के पद से धारा सभा में शिवसागर की नीति-रीति का पूर्व में विरोध करते हुए भी वे सारा मतभेद भूलकर शिवसागर रामगुलाम के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर आज़ादी की लड़ाई में कमर कसकर कूद पड़े ।
स्वतन्त्रता-संग्राम में आर्यसमाज के योगदान का उल्लेख करते हुए पंडित बेणीमाधव रामखेलावन लिखते हैं “१९४८ में जनता को साक्षर मताधिकार दिया। इससे आम चुनाव होने पर विधान सभा में भारतवंशियों की संख्या बढ़ी। बाद में बालिग मताधिकार मिला, जिससे विधान सभा में भारतवंशियों की आवाज़ गूंजने लगी। उत्साहित होकर मज़दूर दल के नेता डॉ० शिवसागर रामगुलाम ने मॉरीशस की स्वतन्त्रता की माँग की। आर्यसमाज ने डॉ० रामगुलाम को अपना पूरा समर्थन दिया। आर्यसमाज की हर एक शाखा में डॉ० रामगुलाम का भव्य स्वागत होता था। उनके सम्मेलनों और जुटावों की व्यवस्था अधिकतर आर्यसमाजी करते थे। देश के अल्पसंख्यकों ने समझा कि स्वतन्त्रता का अर्थ होगा, हिन्दू राज्य। उन्होंने स्वतन्त्रता का भारी विरोध किया। ‘हिन्दू हज़ेमोनी’ का नारा लगाकर अल्पसंख्यों में भय पैदा किया गया। गायताँ जुवाल ने अल्प संख्यकों का नेता बनकर स्वतन्त्रता का घोर विरोध किया। हिन्दुओं के छिट-पुट वर्गों ने अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए विरोधियों का साथ दिया। पर आर्यसमाज ने सम्पूर्ण रूप से बिना किसी अपवाद के, डॉ० रामगुलाम का साथ दिया। उसी आन्दोलन में सुखदेव विष्णुदयाल भी आकर मिल गए । १९६८ में मॉरीशस ब्रिटिश सरकार के जुए से मुक्त हो गया।” (मॉरीशस की स्वतन्त्रता में आर्यसमाज का योगदान, आर्योदय विशेषांक मार्च २००२, पृ० १५, प्रकाशक आर्य सभा मॉरीशस)
आर्यसमाज के प्रति डॉ० शिवसागर रामगुलाम का उद्गार
मॉरीशस के प्रथम प्रधानमन्त्री, सर शिवसागर रामगुलाम ने आर्यसमाज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए १२ मार्च १९६८ को पोर्टलुई के आर्य भवन में आयोजित प्रातःकालीन यज्ञ में भाग लिया। उन्होंने शाँ-दे-मार्स के मैदान में चौरंगा ध्वज लहराने से पहले आर्य सभा में उपस्थित गण्यमान्य जनों और आर्य समाजियों के बीच अपना उद्गार प्रकट किया । सन् १९८२ तक सर शिवसागर प्रधान मन्त्री पद पर आसीन रहे। जब भी किसी शाखा समाज ने उन्हें किसी समारोह में उपस्थित होने की प्रार्थना की, वे सहर्ष उपस्थित होते रहे और आर्यसमाज के कार्यों की प्रशंसा करते रहे।
आर्यसमाज के प्रति माननीय अनिरुद्ध जगनाथ जी के उद्गार
सन् १९९० में आर्यसमाज की स्थापना की अस्सीीं वर्षगांठ मनाई गई। उस अवसर पर एक स्मारिका निकाली गयी थी, जिसमें श्री अनिरुद्ध जगनाथ जी का निम्नलिखित सन्देश छपा था “आर्य सना मोरिशस की स्थपाना की ८० वीं वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर मैं सभा के अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारी गण तथा देशभर के आर्य समाजियों को बधाई देता हूँ।
आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द के आदर्श और सिद्धान्त निश्चित रूप से मानव जीवन को पवित्र और सार्थक बनाते हैं। मॉरीशस में आर्य सभा ने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ भारतीय संस्कृति, हिन्दी भाषा और वैदिक परम्पराओं को जीवित रखने में भारी योगदान दिया है। आर्य सभा द्वारा स्थापित केन्द्रों में आज भी हज़ारों लोग शिक्षा ग्रहण करते हैं।
आज़ादी की जंग में, शराब-सिगरेट बन्दी आन्दोलन में, मज़दूर आन्दोलन में, नारी शिक्षा आन्दोलन में, पाखण्ड उन्मूलन में और चर्म परिवर्तन विरोध आन्दोलन में आर्य सभा की अग्रगण्य भूमिका रही है।
हमारी आज की इस समृद्धि और खुशहाली के लिए पिछले ८० वर्षों में सैकड़ों-हजारों लोगों ने तन-मन-धन अर्पित किये हैं। आज के इस पावन अवसर पर हमें उनको याद करना चाहिए और उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए, ताकि हम भी उनके पदचिहनों पर चल सकें। २१.९.९०
अनिरुद्ध जगनाथ
प्रधान मन्त्री
(आर्योदय स्मारिका, २० अक्तूबर १९९०, पृ० ४)
स्वातन्त्रयोत्तर मॉरीशस के द्वितीय प्रधान मन्त्री सर अनिरुद्ध जगनाथ ने आर्य समाज के कार्यों
पर इस प्रकार प्रकाश डाला है –
१. आर्य सभा दीर्घकाल से सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं है।
२. अविद्या के नाश और विद्या की वृद्धि में, विशेषतया नारी के लाभ और मुक्ति हेतु क्रियाशील रही है।
३. अपने पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए युवा पीढ़ी की तैयारी में वैदिक मूल्य प्रदान करती रही है।
४. आर्य सभा ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में एक शांतिमय समाज स्थापित करने हेतु प्रसन्नता,
सच्चाई, प्रेम और नम्रता का विस्तार किया है।
५. सद्भावना वाले बहुत-से व्यक्तियों ने प्रगति और शांति के लिए प्रयास करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। (आर्योदय स्मारिका, ५ दिसम्बर २००३, पृ० ५)
पराधीन मॉरीशस में त्यागी सेवकगण आर्यसमाज के मन्तव्यों के प्रचार-प्रसार में हिन्दू समाज के अपमान का विष पी पीकर डटे रहे। वे शांति का सन्देश देकर मॉरीशस देश को संगठित बनाये रखने में अनवरत अथक प्रयास करते रहे। उन्होंने अविद्या, अन्धविश्वास और अज्ञान का नाश करके एक स्वस्थ समाज का निर्माण किया। वे मॉरीशस देश के उत्थान में सदैव तत्पर रहे। उन्हीं के पद-चिहनों पर चलकर स्वातन्त्रयोत्तर मॉरीशस में सैकड़ों सेवक आर्यसमाज के अधूरे कायों को पूरा करते करते दिवंगत हो गए। वर्तमान में भी ऐसे बहुत से सेवक वर्षों से समाज की निस्वार्थ सेवा में तल्लीन हैं।
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